विचारणीय:२८

गरीब वह है,जिसका खर्च आमदनी से ज्यादा है।-बूएयर

अर्थात् जब व्यक्ति उतने में जितना वो कमाता है,खर्चा नहीं चलाता अर्थात् फिजूलखर्ची करता है तो अंतत: उसे पैसे न होने की वजह से दूसरों से कर्जा लेना पड़ता है।इस तरह वो कर्ज के दलदल में फंसता चला जाता है।जबकि ऐसा करने की कोई आवश्यकता नहीं होती।यदि हम फिजूलखर्ची न करें और केवल उतना ही खर्च करें जितना आवश्यक हो तो न केवल हम उतने में ही अपना खर्च चला पायेंगे जितना हम कमाते हैं अपितु कल के लिए कुछ बचत भी कर पायेंगे।कहने का अर्थ है फिजूलखर्ची कभी भी नहीं करनी चाहिए।

उस इंसान से ज्यादा गरीब कोई नहीं है,जिसके पास केवल पैसा है।-एडबिन पग

अर्थात् पैसा कभी भी हमेशा एक के पास नहीं रहता।यदि आज ये हमारे पास है तो कल किसी और के पास होगा।कहने का तात्पर्य है कि पैसा होते हुए भी हम निर्धन ही हैं क्योंकि पैसा कभी भी स्थाई नहीं रहता।असली धन है हमारा सत्चरित्र,हमारा ज्ञान,हमारा परोपकार और यश।जो व्यक्ति सज्जन होता है वास्तव में वो ही अमीर है क्योंकि उसका यश और सम्मान उसके मरने के बाद भी हमेशा रहता है।जबकि केवल पैसा होने से कोई हमें सम्मान देगा ऐसा संभव नहीं है।और यदि केवल धन है और सम्मान अथवा यश नहीं तो कोई भी हमेशा के लिए हमें याद नहीं रखेगा। इसलिए असली धन अर्थात् मान-सम्मान और आदर जो एक सज्जन व्यक्ति को मिलता है कमाना चाहिए।

गरीबी विनम्रता की परीक्षा और मित्रता की कसौटी है।-हैजलिट

अर्थात् जब व्यक्ति गरीब होता है तो अक्सर उस में क्रोध की भावना पैदा होने की संभावना रहती है।जो व्यक्ति ऐसे में भी अपना नियंत्रण नहीं खोता और विनम्र बना रहता है वो इस गरीबी की दशा से बाहर आ सकता है।इसलिए गरीबी में ही विनम्रता की परीक्षा होती है।मित्रता की परीक्षा भी गरीबी में ही होती है।जब हम अमीर होते हैं तो हमारे अनेकों मित्र होते हैं किन्तु जैसे ही कभी हम गरीब हो जाते हैं या हमें कोई नुक्सान लग जाता है तो इन में से कई लोग हमसे मित्रता तोड़ देते हैं।जो व्यक्ति ऐसे में भी हमसे मुँह नहीं मोड़ता और सदैव हमारी सहायता में लगा रहता है,वही हमारा सच्चा मित्र होता है।इसलिए गरीबी में ही मित्रता की परीक्षा होती है।

निर्धनता सहने योग्य न होना लज्जाजनक बात है,लेकिन अपने कार्यों द्वारा उसे कैसे भगाना है,यह न जानना और भी शर्मनाक है।-पेरीक्लीज

अर्थात् कभी-कभी गरीबी इतनी कष्टदायक हो जाती है कि उसे सहना बहुत ही कठिन हो जाता है।व्यक्ति को अपनी गरीबी पर लज्जा भी आने लगती है किन्तु इससे भी लज्जा की बात ये है व्यक्ति अपनी इस गरीबी से निकलने का प्रयास ही न करे। यदि हम ये भी नहीं जानते कि किस प्रयत्न के द्वारा हम अपनी गरीबी से निजात पा सकते हैं तो इससे शर्मनाक बात क्या हो सकती है।न जानने का अर्थ ये है कि हम गरीबी से निकलना ही नहीं चाहते क्योंकि यदि निकलना चाहते तो उससे निकलने का मार्ग अवश्य खोजते और मार्ग खोजते तो निकलने का मार्ग भी जानते।इसलिए गरीबी से निकलने का मार्ग न जानना अर्थात् उससे निकलने का प्रयास न करना वास्तव में ही शर्मनाक है।

गरीबी खुद अपमानजनक नहीं है,सिर्फ उस गरीबी को छोड कर,जो आलस्य,व्यसन,फिजूलखर्ची और मूर्खता के कारण हुई हो।-प्लूटार्क

अर्थात् गरीब होना कोई अपमानजनक बात  नहीं है।कभी व्यक्ति जन्मजात गरीब होता है,कभी अपने व्यवसाय में नुक्सान के चलते या काम–धंधा छूट जाने के कारण गरीब हो जाता है।पर ऐसे व्यक्ति अपनी इस गरीबी से निकलने का मार्ग खोज इस से बाहर आ सकते हैं।किन्तु कई लोग अपने आलस्य,व्यसन,फिजूलखर्ची और मूर्खता के कारण अपना नुक्सान कर बैठते हैं और गरीब हो जाते हैं।ऐसे व्यक्ति कभी भी दुबारा अमीर नहीं हो सकते जब तक कि वो अपने ये व्यसन नहीं छोड़ते।अपने व्यसनों,आलस्य,फिजूलखर्ची के द्वारा उत्पन्न गरीबी के कारण वे लोगों के उपहास का पात्र बन जाते हैं।इसलिए ऐसी गरीबी से बढ़कर अपमानजनक कुछ नहीं है।