विचारणीय:३०

सच्चे दोस्त वे हैं,जिनकी देह दो,पर आत्मा एक होती है।-अरस्तु

अर्थात् सच्चा दोस्त वह होता है जो हमारी तरह ही सोचता है।जब हमें दर्द होता है तो उसे भी होता है।जब हमें ख़ुशी मिलती है तो वो भी खुश होता है।जब हमारी तरक्की होती है तो वो सोचता है उसकी तरक्की हो गयी है।अर्थात् सच्चा दोस्त वही होता है जो सुख दुःख में हमारे साथ समान रूप से कंधे से कन्धा मिला कर खड़ा होता है और हर क्षण हमारे काम आता है।अर्थात् जिनकी देह दो पर आत्मा एक होती है।

दोस्ती ख़ुशी को दूना करके और दुःख को बाँटकर ख़ुशी बढ़ाती है तथा मुसीबत कम करती है।-एडिसन

अर्थात् दोस्ती एक दवाई की तरह होती है।जब हमारे साथ सच्चे दोस्त होते हैं और उनकी सच्ची दोस्ती होती है तो हमें अपने ऊपर आने वाली मुसीबत,मुसीबत नहीं लगती,हमें यदि कोई दुःख होता है तो उस दुःख को बाँट कर हमारे मित्र उस दुःख को हल्का करने में हमारी सहायता करते हैं।जब हम सफल होते हैं या जीवन में हमें कोई ख़ुशी मिलती है तो उस ख़ुशी का जश्न हमारे ये मित्र ही मनाते हैं और इस तरह उस ख़ुशी को दूना कर देते हैं।

ज्ञानवान मित्र ही जीवन का सबसे बड़ा वरदान है।-यूरीपिडीज

अर्थात् मित्र तो हमारे अनेकों होते हैं।कुछ ऐसे भी होते हैं जो केवल तब तक हमारे साथ होते हैं,जब तक हम सफल होते हैं।कुछ हर पल हमारा साथ देते हैं,चाहे हमें दुःख हो या सुख।पर केवल दुःख-सुख में साथ देना ही सब कुछ नहीं होता।ऐसे मित्र जो अपनी बुद्धिमत्ता के बल पर,हमें हमारे बुरे दिनों से हमें बाहर निकालने में सहायक होते हैं,वही मित्र हमारे जीवन के लिए सबसे बड़े उपहार होते हैं।ऐसे मित्र जो हमें सही राह दिखायें,हमें गलत कार्य करने से रोकें और वक्त-वक्त पर अपनी कीमती सलाह से हमारी मदद करें,बड़े ज्ञानवान होते हैं और ऐसे मित्र ही जीवन का सबसे बड़ा वरदान हैं क्योंकि ऐसे मित्रों के रहते हमें कभी कोई हानि नहीं हो सकती।

मुँह के सामने मीठी बातें करने और पीठ पीछे छुरी चलानेवाले मित्र को दूधमुँहे विषभरे घड़े की तरह छोड दो।-हितोपदेश

अर्थात् मित्र तो कोई भी हो सकता है।पर अक्सर देखा गया है कि जब हम धनवान होते हैं,साधन संपन्न होते हैं तो हमारे मित्रों की संख्या ज्यादा होती है।वहीँ जब हम गरीब होते हैं या असहाय हो जाते हैं तो हमारे मित्रों की संख्या भी घट जाती है।ऐसा इसलिए होता है कि कुछ लोग केवल हमारी धन सम्पदा का उपयोग करने के लिए ही हमारे मित्र बनते हैं और इनके नष्ट होते ही हमें छोड देते हैं।ऐसे मित्र हमारे सामने मीठी-मीठी बातें करते हैं,हमारी हाँ में हाँ मिलाते हैं किन्तु उनके दिल में हमेशा ये ही विचार रहता है कि हमसे फायदा कैसे उठाया जाए।कुछ मन ही मन हमारी तरक्की पर हमसे जलते हैं और मन ही मन हमें नुक्सान पहुंचाने की सोचते रहते हैं।ऐसे दोस्त उस दूध के घड़े के समान हैं जिसमे वास्तव  में दूध के स्थान पर विष भरा होता है।ऐसे मित्र कभी न कभी हमें नुक्सान दे कर ही जाते हैं।इसलिए ऐसे मित्रों की पहचान कर उन्हें तुरंत छोड देना चाहिए।

सच्चे मित्र को दोनों हाथों से पकड़कर रखो।-नाइजिरियन कहावत

अर्थात् जहाँ हमें अपने से जलने वाले और मन ही मन हमें नुक्सान पहुँचाने की कामना करने वाले मित्र को तुरंत छोड देना चाहिए,वहीं हमें ऐसे मित्रों का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए जो प्रतिक्षण हमारी मंगलकामना करते हैं।चाहे हम उनके सामने हों या न हों वे हमेशा हमारी भलाई की ही बातें करते रहते हैं और कभी भी हमारे लिए अपशब्द इस्तेमाल नहीं करते।ऐसे मित्र ही सच्चे मित्र होते हैं और ऐसे मित्रों का भूल कर भी अपमान या निरादर नहीं करना चाहिए बल्कि ऐसे मित्रों को दोनों हाथों से पकड़ कर रखना चाहिए क्योंकि ऐसे मित्र विरले ही मिलते हैं।