विचारणीय:३१

जो बातें विचार पर छोड दी जाती हैं,वे कभी पूरी नहीं होती।-हरिभाऊ उपाध्य्याय

अर्थात् मनुष्य हमेशा बड़े-बड़े मंसूबे बनाता रहता है।अपने लिए बड़े-बड़े लक्ष्य तय करता है और ऊँचाइयों को छूने की बातें करता है।पर यदि ये बातें केवल सोच तक ही रह जाएँ और कार्यान्वित न की जाएँ तो व्यक्ति कभी भी अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँच सकता।

यदि हम इमारत की नींव ही नहीं रखेंगे तो इमारत का निर्माण कहाँ से होगा।इसलिए यदि हम अपने विचारों को अमल में नहीं लायेंगे तो वो विचार स्वप्न रूप से निकल कर मूर्त रूप कैसे लेंगे।इसलिए कभी भी यदि किसी बात को करने का विचार मन में लाया जाए तो उसे मन में ही न रख कर उस को पूरा करने के लिए प्रयास करना चाहिए।   

दुष्ट विचार ही मनुष्य को दुष्ट कर्म की ओर ले जाता है।-उपनिषद्

अर्थात् हम वैसे ही बन जाते हैं जैसे हमारे विचार होते हैं।प्रत्येक मनुष्य में अच्छे और बुरे दोनों तरह के विचार होते हैं।ये हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम इनमें से कौन से विचार चुनते हैं।

यदि हम दुष्ट विचार चुनेंगे तो ये विचार हमको दुष्ट कर्मों में ही लगायेंगे और हम दुष्ट कर्मों में लगे हुए पतन के भागी होंगे।अत: हमें हमेशा सत्कर्मों के लिए अच्छे विचारों का ही चयन करना चाहिए ताकि हम मोक्ष को प्राप्त कर सकें।

लोग उन भयानक विचारों को भूल जाते हैं,जो उनके अपने मन में चक्कर काटते रहते हैं,और उन्हीं विचारों को दूसरों में पाकर रुष्ट हो जाते हैं।-समरसेट माम

अर्थात् जो हम खुद नहीं हैं वैसा दूसरों को देखने की इच्छा नहीं करनी चाहिए।यदि हम खुद सच नहीं बोल सकते तो दूसरों से भी सच बोलने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए।यदि हम किसी का भला नहीं कर सकते तो दूसरों से भी ये उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वे दूसरों की मदद करें।

अक्सर हम दूसरों के भीतर के बुरे विचारों को देख कर और महसूस कर के उन्हें बुरा समझते हैं और उन से रुष्ट हो जाते हैं।पर हम ये भूल जाते हैं कि यही भयानक विचार हमारे भी मन के किसी कोने में छुपे हुए हैं और मौका देखते ही सर उठा लेते हैं।आवश्यकता है दूसरों को सुधारने से पहले खुद को सुधारा जाए तभी समस्त संसार सुधर सकेगा और स्वर्ग बन सकेगा।

अच्छे विचार रखना भीतरी सुन्दरता है।-स्वामी रामतीर्थ

अर्थात् जिनके विचार उत्तम और सुन्दर होते हैं,वे वैसा ही आचरण भी करते हैं।वे हमेशा दूसरों की भलाई में लगे रहते हैं,दूसरों की ख़ुशी से खुश और उनके दुखों से दुखी होते हैं।

वास्तव में जिनके विचार अच्छे होते हैं उनकी आत्मा अति पवित्र होती है और यही भीतरी सुन्दरता की निशानी होती है।अत: हमेशा उत्तम विचार रखने चाहिए ताकि हम न केवल बाहर से अपितु भीतर से भी सुन्दर बन सकें।

जो विचार कार्यरूप में परिणत नहीं होता,उसकी ‘गर्भपात’ से तुलना की गयी है।उस कर्म की,जो विचार पर आश्रित नहीं है,उसकी अन्धेरखाने और अराजकता में गिनती है।-जवाहरलाल नेहरू

अर्थात् यदि कोई उत्तम विचार हमारे मन में आता है और उसको हम कार्यान्वित नहीं करते तो वो विचार एक समय के बाद नष्ट हो जाता है।वहीँ यदि व्यक्ति बिना सोचे विचारे कार्य करता है तो उसका कोई अच्छा फल नहीं होता अपितु चारों ओर अराजकता और अंधेरगर्दी ही फैलती है।

इसलिए हमें सोच विचार कर उत्तम विचारों को चुन कर कार्यान्वित करना चाहिए ताकि सुराज्य का माहौल बने और हर कोई खुश रह सके।