विचारणीय:३२

क्रोध को जीतने में मौन जितना सहायक होता है,उतनी और कोई भी वस्तु नहीं।-महात्मा गाँधी

अर्थात् जब कोई हम पर क्रोधित होता है तो हमको बुरा-भला कहने लगता है।बदले में हम भी क्रोधित हो उठते हैं और दूसरे को बुरा भला कहते हैं।जिस प्रकार आग में घी डालने पर वो और भड़क उठती है,उसी प्रकार हमारा आपसी क्रोध हमारे आपसी झगडे को और बढाने का काम करता है।

वहीं यदि हम मौन रहते हैं तो क्रोध करने वाले व्यक्ति को भी एहसास होने लगेगा कि वो गलती पर है और हम पर व्यर्थ में क्रोध कर रहा है।साथ ही साथ हमारे पलट कर जवाब न देने के कारण उसका क्रोध और नही भड़केगा।इस प्रकार धीरे-धीरे उसका क्रोध शांत हो जाएगा।इसलिए कहा है कि क्रोध को जीतने में मौन जितना सहायक होता है,उतनी और कोई भी वस्तु नहीं।

मुझे बोलने पर अक्सर खेद हुआ है;चुप रहने पर कभी नहीं।-साइरस

अर्थात् जब हम बोलते हैं तो अक्सर तोलते नही कि हम सही बोल रहे हैं अथवा गलत,या हमें ऐसा बोलना चाहिए था या नहीं।ऐसे में अक्सर हम ऐसी बातें बोल जाते हैं जो अन्यों को बुरी लग सकती हैं।बाद में हमें एहसास होता है कि हमें ऐसा नही बोलना चाहिए था।

पर जिस प्रकार कमान में से निकला हुआ तीर वापस नही आ सकता,उसी प्रकार मुँह से निकले बोल वापस नही लिए जा सकते।केवल बाद में खेद ही प्रकट किया जा सकता है।इसलिए यहाँ कहा है कि बोलने पर अक्सर खेद हुआ है,चुप रहने पर कभी नहीं।

जैसे घोंसला सोती हुई चिड़ियों को आश्रय देता है वैसे ही मौन तुम्हारी वाणी को आश्रय देता है।-रवीन्द्रनाथ ठाकुर

अर्थात् मौन रह कर हम न केवल व्यर्थ के वाद-विवाद से बच सकते हैं बल्कि इस बात पर भी विचार कर सकते हैं कि हम अपनी वाणी को कैसे रखें ताकि वो सभी को प्रियकर लगे।

मौन रह कर ही हम जान सकते हैं कि मधुर वचनों का कितना महत्व है।इसलिए जिस प्रकार हमारे आश्रयदाता हमारा हर ओर से ख्याल रखते हैं और हमें अप्रिय घटना से बचाते हैं उसी प्रकार मौन भी हमारी वाणी को अप्रिय बोलने से बचाता है,इसलिए हमारी वाणी का आश्रयदाता है।

मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक् शक्ति होती है।-कार्लाइल

अर्थात् मौन रह कर हम दूसरे व्यक्ति को ये सन्देश दे सकते हैं कि जो वो कह रहा है या कर रहा है,हम उस से सहमत नहीं हैं।यदि हम कुछ बोलेंगे तो हो सकता है ये वाद-विवाद को न्योता दे दे।पर जब हम मौन रह कर सामने वाले को ये जता देते हैं कि जो वो करना चाहता है या कर रहा है,ठीक नही है तो वो अपनी गलती समझ कर उसे सुधार सकता है।

इसी प्रकार हमसे लड़ाई करने वाले को भी हम मौन रह कर ये सन्देश दे देते हैं कि हम उसके द्वारा किये जाने वाले झगडे को कोई महत्व नहीं देते और उससे झगड़ना नहीं चाहते।इस प्रकार ठीक कहा गया है कि मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक् शक्ति होती है।

आपदा में मौन रहना अति श्रेयस्कर है।-ड्राइडेन

अर्थात् जब हम पर कोई आपदा आ जाए अथवा कोई हम पर क्रोधित हो जाए तो मौन रहने में ही भलाई है क्योंकि पता नहीं हमारे मुँह से कब कोई ऐसी बात निकल जाए जो या तो हमारे खिलाफ चली जाए अथवा किसी का हमारे प्रति क्रोध और बढ़ा दे।

वहीं यदि हम मौन रहते हैं तो व्यर्थ के वाद-विवाद में न पड़ कर उस विपदा से निकलने का बेहतर हल खोज सकते हैं,अथवा ऐसा कर के क्रोध करने वाले व्यक्ति का क्रोध शांत कर सकते हैं।इसलिए कहा है कि आपदा में मौन रहना अति श्रेयस्कर है।