विचारणीय:३४

मन ही मनुष्य को स्वर्ग या नरक में बिठा देता है।स्वर्ग या नरक में जाने की कुँजी भगवान् ने हमारे हाथ में दे रखी है।-स्वामी शिवानन्द

अर्थात् हमारे मन में अच्छी और बुरी दोनों तरह को भावनाएँ होती हैं।हम इसमें से क्या चुनते हैं ये हमारे विवेक पर ही निर्भर करता है।जैसा मार्ग हम चुनते हैं वैसा ही हम बन जाते हैं।बुरी भावनाएँ हमसे बुरे काम करवाती हैं और हमारा जीवन नरक बन जाता है।वहीँ अच्छी भावनाएँ हमसे अच्छे कार्य करवाती हैं और हम मोक्ष के और भी करीब जाने लगते हैं।

जब हम पाप कर्म करते हैं तो हम नरक के भागी हो जाते हैं और हमारे अच्छे कर्म हमें स्वर्ग का अधिकारी बनाते हैं।हम अच्छे या बुरे में से क्या चुनते हैं और परिणाम स्वरुप स्वर्ग या नरक के भागी बन जाते हैं,की चाभी हमारे पास स्वयं होती है।ये हमारा मन ही है जो अच्छा या बुरा चुनता है और हमें स्वर्ग या नरक में बिठा देता है।

जिसने मन को जीत लिया,उसने जगत को जीत लिया।-स्वामी शंकराचार्य

अर्थात् हमारा मन नित्य चलायमान है और सदा इधर-उधर भटकता रहता है।इसलिए वो विषय-वासना में भटकता रहता है और सदा अशांत रहता है।पर जिसने अपनी इन्द्रियों पर काबू पा लिया,उसके मन का इधर-उधर भटकना बंद हो जाता है और प्रभु में लग जाता है।इस प्रकार के व्यक्ति का कोई शत्रु नहीं होता और वो हर परिस्थिति में स्थिर रहता है।इस प्रकार वह इस जगत की भूल भूलैयाओं को परास्त कर जगत के बंधन से छूट जाता है।अर्थात् जगत को जीत लेता है।

जब तक मन नहीं जीता जाता,राग-द्वेष शांत नहीं होते,तब तक मनुष्य इन्द्रियों का गुलाम बना रहता है।-विनोबा भावे

अर्थात् मन जो हमेशा चलायमान है उसे काबू में रखना बड़ा ही मुश्किल होता है।मन की चलायमान अवस्था में हम किसी से स्नेह करने लगते हैं,किसी से जलने लगते हैं या किसी से दुश्मनी करने लगते हैं।पर जब हम मन को ध्यान अवस्था द्वारा एक जगह टिकाने में सफल होने लगते हैं तो हम अपनी इन्द्रियों पर काबू पाने लगते हैं।इसलिए जिसने मन को जीत लिया,उसने अपनी इन्द्रियों को काबू में कर लिया,ऐसा कहा गया है।

जब तक मन अस्थिर और चंचल है,तब तक अच्छा गुरू और साधु लोगों की संगति मिल जाने पर भी कोई लाभ नहीं होता।-रामकृष्ण परमहंस

अर्थात् चाहे हमें कितना भी अच्छा गुरू मिले,चाहे हम कितना भी साधु लोगों की संगति करें,यदि हमारा मन अस्थिर और चंचल है,तो कोई लाभ नहीं है क्योंकि अस्थिरता और चंचलता की अवस्था में हम,गुरुजनों और साधुओं की बताई हुई बातों को ध्यान से सुन कर मनन नहीं करेंगे और जब तक उनके द्वारा बताये हुए हमारे भले के रास्ते को हम अपनाएंगे नहीं तो उनकी संगती का क्या लाभ।साधु संतों की संगति का लाभ तो तभी है जब हम उनके बताये हुए सद्मार्गों पर चलें,पर इन्द्रियों की चंचलता के कारण हम विषय-वासनाओं में ही उलझे रहते हैं और साधु संतों की संगति का लाभ नहीं उठा पाते।

चलते,खड़े होते,बैठते अथवा सोते हुए जो अपने मन को शांत रखता है,वह अवश्य ही शान्ति प्राप्त कर लेता है।-महात्मा बुद्ध

अर्थात् यदि हम अपनी इन्द्रियों को वश में कर लेते हैं तो हमारा मन स्थिर हो जाता है।जब हम अपने मन को स्थिर और शांत रखेंगे तो व्यर्थ के भाव उसमें नहीं आयेंगे।इस प्रकार न किसी के प्रति द्वेष होगा,न ईर्ष्या और न ही किसी से नफरत।जब ये नकारात्मक विचार हमारे मन में नहीं होंगे तो हम अवश्य ही शान्ति प्राप्त कर लेंगे।