विचारणीय:३५

भलाई जितनी अधिक की जाती है,उतनी ही अधिक फैलती है।-मिल्टन

अर्थात्  समाज में भलाई से अच्छा कुछ नहीं है।जब हम किसी की भलाई करते हैं तो उसके मन में भी करुणा और अच्छे भावों का संचार होने लगता है।जिस प्रकार पुष्प की खुशबू हर ओर फ़ैल जाती है उसी प्रकार सामने वाले व्यक्ति के मन में भी, हमें भलाई के कार्य करते देख कर,किसी अन्य की भलाई करने की भावना आने लगती है।इस प्रकार एक व्यक्ति से दूसरे और दूसरे से तीसरे में और फिर धीरे-धीरे ये भावना फैलती ही जाती है।

जो दूसरों की भलाई करता है,वह अपनी भलाई अपने-आप कर लेता है।भलाई फल में नहीं,अपितु कर्म करने में ही है;क्योंकि शुभ कर्म करने का भाव ही अच्छा पुरस्कार है।–सेनेका

अर्थात् जब हम दूसरों की भलाई करते हैं तो हमारे मन में सद्भाव,प्रेम,करुणा,दया आदि सद्गुण आने लगते हैं।जब हम बिना किसी प्रतिफल की इच्छा किये बिना इस प्रकार के सद्कर्म करते हैं तो हमारे भीतर जो अच्छाई की भावना और सद्कर्म जन्म लेते हैं वो हमें प्रभु के और भी करीब कर देते हैं और हम जन्म मरण के चक्र से मुक्त हो कर मोक्ष के अधिकारी बन जाते हैं।शुभ कर्म करने का भाव ही सबसे अच्छा पुरस्कार है जो हमें मोक्ष के द्वार तक ले जाता है।इस प्रकार दूसरों की भलाई कर के हमारी भलाई स्वत: ही हो जाती है।

मनुष्य की भलाई करने के अलावा और अन्य किसी कर्म द्वारा मनुष्य भगवान् के इतने समीप नहीं पहुँच सकता।-सिसरो

अर्थात् हम भगवान् को दयानिधि,दयालु,दीनानाथ आदि नामों से पुकारते हैं।भगवान् सदा अपने भक्तों की ही भलाई में लगे रहते हैं।जब हम इस निमित अन्यों के प्रति भलाई का कार्य करते हैं तो भगवान् हमसे बहुत प्रसन्न हो जाते हैं।भलाई द्वारा हममें सदगुण और सद्भावना का संचार होता है जो भगवान् के करीब पहुँचने के लिए अति आवश्यक है।हम सब भगवान् की संतानें हैं और जब हम एक दूसरे की भलाई का कार्य करते हैं तो हम भगावन के अति समीप पहुँच जाते हैं।

भलाई रह जाती है,इसके अतिरिक्त सब वस्तुएँ नष्ट हो जाती हैं।-जापानी कहावत

अर्थात् व्यक्ति साम-दाम-दंड-भेद आदि द्वारा धन-संपत्ति एकत्र करता रहता है।वो इन नाशवान भौतिक वस्तुओं के प्रति अति मोहित रहता है।पर जब इस संसार से विदा होता है तो जो कुछ भी धन-संपत्ति उस ने संचय की होती है वो सब यहीं पर रह जाती है।ऐसे व्यक्ति को समाज में कोई भी याद नहीं रखता।पर जब व्यक्ति धर्म-कर्म और भलाई के कामों में लग जाता है तो जिस व्यक्ति की भलाई की जाती है वो व्यक्ति ताउम्र भलाई करने वाले को याद रखता है।भलाई करने वाले व्यक्ति को देख कर उसके मन में भी भलाई करने की भावना आने लगती है।इस प्रकार व्यक्ति के जाने के बाद भी भलाई की भावना बची रहती है।

पुष्प की सुगंध वायु की विपरीत कभी नहीं जाती परन्तु मानव के सदगुण की महक सब तरफ फ़ैल जाती है।-चाणक्य

अर्थात् जब हम भलाई के कार्य करते हैं,सद्गुणों से भरे होते हैं तो हमारे साथ संपर्क में आने वाला प्रत्येक व्यक्ति भी इससे अछुता नहीं रहता।उनके मन में भी कभी न कभी भलाई की भावना और सदगुण आने लगते हैं।इस प्रकार एक व्यक्ति से दूसरे,दूसरे से तीसरे और धीरे-धीरे प्रत्येक मनुष्य में सद्भावना और सदगुण घर कर सकते हैं।इसलिए मानव के सदगुण की महक सब ओर फैल जाती है।