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पाप में पड़नेवाला मानव होता है,जो पाप पर पछताता है वह सज्जन है,जो पाप पर गर्व करता है वह शैतान है।-थॉमस फुलर

अर्थात् मनुष्य के भीतर सज्जनता और दुर्जनता दोनों तरह के ही गुण होते हैं.हम क्या चुनते हैं ये हम पर ही निर्भर करता है।कभी-कभी हम स्वभाववश तो कभी अज्ञानतावश पाप कर्मों में पड जाते हैं।पाप कर्म करने के बाद जो व्यक्ति अपने किये हुए कर्मों पर लज्जित होता है और पछतावा करता है वो फिर भी सज्जन है क्योंकि उसे पता है कि उसने गलत कार्य किया है पर कुछ व्यक्ति ऐसे होते हैं जो जानते हैं कि उन्होंने पाप कर्म किया है पर फिर भी लज्जित होने की बजाय वो उस पर गर्व महसूस करते हैं।ऐसे व्याक्ति शैतान के समान हैं क्योंकि वे अपने पाप कर्म कभी नहीं छोड़ेंगे।लज्जित होने वाला व्यक्ति भविष्य में पाप कर्म करने से बचेगा पर लज्जित न होने वाला व्यक्ति तो पाप कर्मों में धंसता ही चला जाएगा और शैतान स्वरुप हो जाएगा।

पाप करने का अर्थ यह नहीं कि जब वह आचरण में आ जाए,तब ही उसकी गिनती पाप में हुई।पाप तो जब हमारी दृष्टि में आ गया,विचार में आ गया वह हमसे हो गया।-महात्मा गाँधी

अर्थात् केवल पाप करने के बारे में सोच लेना ही पाप करने जैसा है क्योंकि जब एक बार बुरी भावना मन में आ गयी तो हमारे सभी संस्कार और पुण्य कर्म नष्ट हो गए।किसी के बुरे की भावना मन में रखना भी उस व्यक्ति का बुरा करने के समान है।केवल बुरे विचारों को कार्य रूप में करने से ही वो पाप नहीं बनेगा।इसलिए कभी भी बुरे विचार मन में नहीं लाने चाहियें।

पाप का फल दुःख नहीं,किन्तु एक दूसरा पाप है।मनुष्य जब एक बार पाप के नागपाश में फँसता है,तब वह उसी में और भी लिपटता जाता है।-जयशंकर प्रसाद

अर्थात् जब व्यक्ति कोई पाप करता है तो यदि उस की अंतरात्मा उसे नहीं धिक्कारती और वो पछतावा नहीं करता तो उस पाप को छुपाने के लिए वो दूसरा पाप करता है और इस तरह पाप करता जाता है और पाप के चंगुल में फंस जाता है।यदि वो अपने पाप को छुपाये नहीं और उसे स्वीकार कर ले तो केवल एक बार उसे उस की सजा मिलेगी और फिर वो पाप मुक्त हो जाएगा।इसलिए अधिक दुखद पाप का फल नहीं अपितु पाप के चंगुल में फंस जाना है।

पाप अग्नि का वह कुण्ड है जो आदर और मान,साहस और धैर्य को क्षणभर में जलाकर भस्म कर देता है।-प्रेमचन्द

अर्थात् जब व्यक्ति पाप करता है तो लोग उससे नफरत करने लगते हैं।लोगों की नजरों में उस व्यक्ति की कोई इज्जत नहीं रहती और वो अपना आदर और मान खो देता है।पाप कर्म करने के बाद उसका मन इस डर से घिर जाता है कि कभी किसी ने देख न लिया हो और पता नहीं उस के पाप की उसे क्या सजा मिलेगी।इसलिए उसका साहस जवाब दे देता है और वो डर में जीने लगता है।इसलिए पाप अग्नि का वो कुण्ड है जो आदर और मान,साहस और धैर्य को क्षणभर में जलाकर भस्म कर देता है।

पाप की स्वीकृति मुक्ति का श्रीगणेश है।-ल्यूथर

अर्थात् जब व्यक्ति पाप करता है तो उस के पास दो विकल्प होते हैं –उस पाप को स्वीकार कर लेना और सजा भुगतना अथवा उस पाप को छुपा लेना।यदि व्यक्ति पाप को छुपाता है तो उसको छुपाने के चक्कर में वो और पाप करने लगता है और पाप के भंवर में फंस जाता है।पर यदि वो अपने पाप को स्वीकार लेता है तो न केवल वो इस ग्लानि से कि उसने पाप किया है मुक्त हो जाएगा अपितु भविष्य में भी पाप करने से बच जाएगा अर्थात् पाप के दुश्चक्र से मुक्त हो जाएगा।इसलिए पाप की स्वीकृति मुक्ति का श्रीगणेश है।