विचारणीय:३७

नम्रता पत्थर को भी मोम कर देती है।-प्रेमचंद

अर्थात् कोई यदि हम पर क्रोध कर रहा हो या हमसे नाराज हो तब हमें शांत और विनम्र रहना चाहिए क्योंकि यदि हम ऐसा करेंगे तो न केवल सामने वाले का क्रोध शांत हो जाएगा अपितु उसकी नाराजगी भी ख़त्म हो जायेगी।वहीँ,यदि हमें किसी से अपनी बात मनवानी हो या अपना कोई काम सिद्ध करवाना हो तो भी हम विनम्र रह कर ही ऐसा करवा सकते हैं।यदि हम तेज हो कर या क्रोधपूर्वक अपना कार्य निकलवाने की सोचेंगे तो हम अपना कार्य किसी से भी नहीं निकलवा सकते।नम्रता तो ऐसा गुण है जो पत्थर को भी मोम कर देता है।

विनम्रता का अर्थ है,दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करना जैसा आप अपने साथ किया जाना पसंद करते हैं।-चेस्टरफील्ड

अर्थात् हम हमेशा चाहते हैं कि लोग हमारे साथ प्रेम और आदर का व्यवहार करें। हम से हँस कर बोलें और वक्त बेवक्त हमारे काम आयें।जब हम औरों से ऐसा चाहते हैं तो हमें भी औरों से वैसा ही व्यवहार करना चाहिए।इसी को विनम्रता कहते हैं।जब हम विनम्रता का व्यवहार करते हैं तभी हमें बदले में विनम्रता मिलती है।क्योंकि जैसा बीज हम बोयेंगे वैसा ही तो फल मिलेगा।

गर्ववश देवता दानव बन जाते हैं और नम्रता से मानव देवता।-आगस्टाइन

अर्थात् जब हम अपने आप पर गर्व या अहंकार करने लग जाते हैं तो दूसरे व्यक्ति हमें तुच्छ नजर आने लगते हैं।जब वे हमें तुच्छ नजर आने लगते हैं तो हम उनसे वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं और दानव समान हो जाते हैं जो केवल अपने बारे में ही सोचता है और सदा औरों को कष्ट और दुःख देता रहता है।जब व्यक्ति अपने द्वारा किये हुए सत्कार्यों पर गर्व करने लगता है और उनका बखान करते नहीं थकता तो उसके द्वारा किये हुए कार्य नगण्य हो जाते हैं और वो देवता से दानव बन जाता है।वहीँ एक साधारण मनुष्य भी विनम्रता के द्वारा लोगों का मन मोह लेता है और उनके हृदय में देव स्वरुप विराजमान हो जाता है।

नम्रता सारे सद्गुणों का दृढ स्तम्भ है।-कन्फ्यूशस

अर्थात् जब व्यक्ति नम्र होता है तो उसके अन्दर संतोष,प्रेम,सत्कार,दया भाव,परोपकार आदि की भावना स्वत: ही आ जाती है।ये सारे गुण ही सद्गुण हैं।जब तक व्यक्ति के अन्दर नम्रता रहती है तब तक ये सद्गुण उसके साथ रहते हैं।जैसे ही विनम्रता समाप्त हुई वैसे ही व्यक्ति के अन्दर ईर्ष्या,द्वेष,क्रोध,अहंकार आदि दुर्गुण जन्म लेने लगते हैं।इसलिए कहा गया है कि सदा विनम्र रहो क्योंकि नम्रता सारे सद्गुणों का दृढ स्तम्भ है।

उड़ने की अपेक्षा जब हम झुकते हैं तब विवेक के ज्यादा नजदीक होते हैं।-वर्ड्सवर्थ

अर्थात् जब व्यक्ति अपनी उपलब्धियों पर,अपनी धन संपत्ति पर अहंकार करने लगता है अर्थात् उड़ने लगता है तब उसकी सोचने समझने की शक्ति पर जैसे पर्दा पड़ जाता है।वह विवेक शून्य होने लगता है।वहीँ,जब व्यक्ति अपनी उपलब्धियों को झुक कर स्वीकार करता है और उन पर अहंकार नहीं करता तब वह अपना विवेक नहीं खोता।अहंकार से विवेक खो जाता है।इसलिए हमें सदा विनम्र रहना चाहिए।जब हम विनम्र रहेंगे तो जय-पराजय,मान-अपमान सफलता-असफलता आदि को समान रूप से लेंगे और व्यर्थ का अहंकार नहीं करेंगे।ठीक ही कहा है उड़ने की अपेक्षा जब हम झुकते हैं तब विवेक के ज्यादा नजदीक होते हैं।