विचारणीय:३८

सेवा हृदय और आत्मा को पवित्र करती है।सेवा से ज्ञान प्राप्त होता है,और यही जीवन का लक्ष्य है।-स्वामी शिवानन्द

अर्थात् जब व्यक्ति पर सेवा में लग जाता है तो उसके मन में सद्गुणों का संचार होने लगता है क्योंकि उसके मन से द्वेष,ईर्ष्या,क्रोध आदि की भावना समाप्त होने लगती है।इस प्रकार सेवा से हृदय और आत्मा पवित्र हो जाती है।जब हम दूसरों की सेवा करते हैं तो हमें उनसे कुछ न कुछ सीखने को मिलता है।न केवल सेवा प्राप्त करने वाला हमें कुछ सिखा जाता है अपितु सेवा द्वारा हम जीवन मूल्यों को स्वत ही सीख जाते हैं।इस प्रकार सेवा से ज्ञान भी प्राप्त हो जाता है।जीवन का परम लक्ष्य है,जन्म मरण के चक्र से निकल कर मोक्ष को प्राप्त करना।जब सेवा के द्वारा व्यक्ति को ज्ञान की प्राप्ति होती है और उसका हृदय और आत्मा पवित्र हो जाती है तो वो जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर लेता है।

सेवा से शत्रु भी मित्र हो जाता है।-वाल्मीकि

अर्थात् जब हमारे मन में परोपकार और परसेवा की भावना घर कर जाती है तो दोस्त और दुश्मन का फर्क ख़त्म हो जाता है।हम अपने शत्रु की भी उसी प्रकार सेवा करते हैं जिस प्रकार हम अपने मित्रों की करते हैं।शत्रु के मन में भी हमारे सेवा कार्यों को देख कर हमारे प्रति शत्रुता समाप्त होने लगती है और उसके मन में हमारे प्रति आदर और प्रेम की भावना घर करने लगती है।इस प्रकार वो हमारा मित्र बनने लगता है।सेवा के द्वारा हम अपने कट्टर शत्रुओं को भी मित्र बना सकते हैं।

जो यह सोचते हैं कि किसी प्रकार की सेवा करने योग्य नहीं हैं,वे कदाचित् पशुओं और वृक्षों को भूल जाते हैं।-अरंडेल

अर्थात् प्रत्येक मनुष्य के अन्दर ये सामर्थ्य होता है कि वो अन्य व्यक्तियों की सेवा और मदद कर सके।किसी की सेवा करने के लिए जरूरी नहीं है कि हम बहुत धनवान हों या बहुत प्रतिष्ठित हों।बिना पैसे और रुतबे के भी व्यक्तियों की सेवा की जा सकती है।बस इसके लिए मन में इच्छा शक्ति होनी चाहिए।पशु और वृक्ष चाहे बहुत सामर्थ्यवान नहीं हैं फिर भी वे अपने फलों ,अपने अंगों और अपनी वफ़ादारी द्वारा अन्यों की सेवा करते हैं।हमें इन से सीख कर सेवा भाव खुद में पैदा करना चाहिए।

सेवा के लिए पैसे की जरूरत नहीं होती,जरूरत है अपना संकुचित जीवन छोड़ने की,गरीबों से एकरूप होने की।-विनोबा भावे

अर्थात् जैसा उपरोक्त लिखा है सेवा के लिए जरूरी नहीं है कि हम खूब पैसे वाले हों।सेवा सिर्फ पैसे की नहीं होती।सेवा का अर्थ है किसी के सुख-दुःख में काम आना।ये उसके कार्यों में हाथ बंटा कर,उसको हौसला दे कर या मुसीबत के समय उसके साथ खड़ा रह कर,किया जा सकता है।इसके लिए जरूरी है हम केवल अपने बारे में न सोचें।हमें इस संकुचित मानसिकता और जीवन से निकलना होगा जिसमें केवल मैं और मेरा परिवार आता है और अन्यों के लिए कोई स्थान नहीं है।जब तक हम केवल अपने बारे में सोचेंगे तो हम दीन दुखियों की,गरीबों की मदद कैसे करेंगे।जब हम गरीबों के साथ एक रूप होंगे,उनके सुख दुःख में उनके साथ खड़े होंगे तभी सच्ची सेवा मानी जायेगी।

गरीबों की सेवा ही ईश्वर की सेवा है।-सरदार वल्लभभाई पटेल

अर्थात् ईश्वर को गरीबनवाज यूँ ही नहीं कहा जाता।भगवान् का कहना है गरीबों के,दीन दुखियों के काम आओ,उनकी मदद करो।जब हम गरीबों को मदद देते हैं,उनकी सेवा आदि करते हैं तो भगवान् को बहुत संतुष्टि मिलती है।ईश्वर की सेवा करनी है तो गरीब की सेवा करो।भगवान् की सेवा स्वत: ही हो जायेगी।