विचारणीय:८

प्लेटो मेरा दोस्त है,एरिस्टोटल मेरा दोस्त है किन्तु मेरा सबसे बड़ा दोस्त सच्चाई है–इसाक़ न्यूटन

अर्थात् व्यक्ति के कई दोस्त हो सकते हैं किन्तु मनुष्य का सबसे बड़ा दोस्त सच्चाई ही है।दोस्त वो होता है जो प्रत्येक परिस्थिति में हमारा साथ दे।सच्चाई एक ऐसा दोस्त है जो जीवन के हर उतार-चड़ाव में हमारे साथ रह सकता है।जो सच्चाई की राह पर चलते हैं उनको कभी किसी के आगे सर नहीं झुकाना पड़ता।सच्चाई की राह पर चलने वाले को उसकी सच्चाई एक अच्छे मित्र की भांति हाथ पकड़ कर जीवन की कठिन परिस्थितियों से बाहर खींच लाती है।जिस प्रकार एक अच्छा मित्र हमें सही गलत का भेद बताता है उसी प्रकार सच्चाई की राह पर चलने वाला भी गलत-सही का फर्क कर सकता है।वस्तुतः सच्चाई ही किसी मनुष्य का सबसे बड़ा दोस्त होती है।

आपके पास मस्तिष्क है,आपके पैर जूतों में हैं,आप स्वयं को किसी भी दिशा में ले जा सकते हैं जिसमें आप चाहेंजो कुछ भी आप करते हैं अपने दम पर कर रहे हैं …केवल आप ही निर्धारित कर सकते हैं कि आपको कहाँ जाना है–डॉ सुस

अर्थात् भगवान् ने प्रत्येक मनुष्य को सोचने समझने की शक्ति दी है।जीवन के प्रत्येक कार्य को करने में भी हम सभी स्वतंत्र हैं।जब हम सोच सकते हैं तो क्या सही है और क्या बुरा इसकी भी हमें समझ होनी चाहिए।जीवन में अच्छाई का रास्ता और बुराई का रास्ता दोनों ही हैं।अच्छाई का रास्ता लम्बा,कठिनाई भरा होता है और बुराई का रास्ता छोटा और सुगम दिखाई देता है।किन्तु ये हमारे विवेक पर है कि हम कौन से रास्ते पर चलना चाहते हैं।बुराई से भरे एक ऐसे रास्ते पर जहां रुपया पैसा तो बहुत है पर मन का सकून,आत्म-सम्मान की भावना नदारद है और जहाँ लोग हमसे नफरत करते हैं और हम एक मुजरिम की भांति क़ानून से डरते हैं या अच्छाई के रास्ते पर जहां लोगों का प्यार है,हमारा आत्मसम्मान है,सुख है शांति है।आगे चल कर बुराई का रास्ता केवल जेल तक ही जाता है जबकि अच्छाई का रास्ता हमें सदियों तक लोगों के दिलोदिमाग पर राज करने योग्य बनाता है।

एक भारतीय सिद्धांत का कहना है कि प्रत्येक व्यक्ति चार कमरों से बना एक घर होता है –शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक और आध्यात्मिकजब तक हम प्रत्येक कमरे में प्रतिदिन नहीं जाते,चाहे केवल इसे हवा देने के लिए,हम पूरी तरह से इंसान नहीं बन सकते–रुमेर गॉडैन

अर्थात् हमें प्रत्येक दिन अपनी शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक और आध्यात्मिक अवस्था को परखना चाहिए।जिस प्रकार ठहरे हुए पानी में काई जम जाती है,उसी प्रकार यदि हम अपने दिलोदिमाग को प्रतिदिन टटोलेंगे नहीं तो हमारा विकास कैसे होगा।इंसान बनने के लिए जरूरी है कि हम अपनी शारीरिक क्षमताओं का,मानसिक विकास का नित्य जायजा लेते रहें और जहां कमी लगे उसे ठीक करते रहें।अपने मन को टटोलते रहें कि कहीं ये आध्यात्म के रास्ते से भटक तो नहीं रहा और यदि ऐसा हो रहा हो तो इसे रोकने का उपाय करें।जिस प्रकार किसी मशीन को प्रतिदिन रखरखाव की जरूरत होती है उसी प्रकार हम मनुष्यों को भी हमारे शारीरिक,मानसिक,भावनात्मक और आध्यात्मिक रखरखाव की जरूरत होती है।

सफलता की सीढ़ी,अवसर के पायदान पर कदम रखकर सबसे बेहतर चढ़ी जाती है। एन रैंड

अर्थात् जब हम अपने लिए लक्ष्य निर्धारित करते हैं और उस के लिए दिलोजान से प्रयत्न कर रहे होते हैं तो कई बार हमें सफलता नहीं मिल रही होती।इससे निराश होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि कई बार हम प्रयास तो कर रहे होते हैं लेकिन उस लक्ष्य तक पहुँचने के लिए एक अवसर जो चाहिए होता है वो अभी तक नहीं आया होता है।जब अवसर आता है और हम उस अवसर की पहचान कर उसे लपक लेते हैं तो हम सरलता से सफलता की सीढ़ी चढ़ जाते हैं।इसलिए प्रयत्नपूर्वक जीवन में आने वाले सुअवसरों को पहचानने और उन्हें भुनाने  की कोशिश करते रहना चाहिए।

कुछ अन्य करने से पहले, तैयारी सफलता की कुंजी है।अलेक्जेंडर ग्राहम बेल

अर्थात् जिस प्रकार युद्ध में जाने से पहले योद्धा अपने हथियारों की धार तेज करते हैं,हथियारों को सुव्यवस्थित करते हैं,ठीक उसी प्रकार किसी भी कार्य को करने से पहले,अर्थात् जीवन युद्ध-क्षेत्र में उतरने से पहले उस कार्य को करने के लिए जिन-जिन बातों की आवश्यकता है वो पूरी कर लेनी चाहिए।आने वाली समस्याओं का भी विचार कर के उस के लिए भी तैयारी कर लेनी चाहिए।साथ ही साथ अपने आप को भी शारीरिक और मानसिक रूप से किसी भी परिस्थिति का सामना करने योग्य बना लेना चाहिए,तब किसी काम को करना चाहिए।जब हम इस प्रकार सोच-विचार कर और पूरी तैयारी के साथ काम करेंगे तो सफलता अवश्य हमारे कदम चूमेगी।