विचारणीय:९

किंग तंग के स्नान टब पर ये शब्द उत्कीर्ण थे :यदि आप एक दिन खुद का पुनरुद्धार करोगे,तो प्रतिदिन ऐसा करो।हाँ ,चलो वहाँ दैनिक नवीकरण हो।-कांफुचियन 

अर्थात् मनुष्य को प्रतिदिन रुक कर इस बात का अवलोकन कर लेना चाहिए कि वह किस दिशा में जा रहा है।वह नेकनीयती,सच्चाई और परोपकार के पथ पर अग्रसर है या उसमें कुछ अवगुण आ गए हैं।अक्सर वक्त के साथ –साथ जीवन में कुछ अवगुण आ जाते हैं।दैनिक नवीकरण का अर्थ है अपने भीतर झाँक कर प्रतिदिन अपने चित्त को निर्मल कर लेना और उसमें आये हुए किसी भी अवगुण को दूर कर देना।

अपने साथी मनुष्यों से श्रेष्ठतर होने में,कुछ भी महान नहीं है।सच्ची महानता अपने पूर्व स्व: से बेहतर होने में है।–अर्नेस्ट हेमिंग्वे

अर्थात् मनुष्य को स्वयं को सुधारने का प्रयास करना चाहिए और प्रतिक्षण इस बात पर जोर देना चहिये कि वो पहले से बेहतर हो सके।उसे सदा अपने आत्मिक,मानसिक और भावनात्मक विकास में लगे रहना चाहिए क्योंकि जिसने रोज अपने मानसिक,आत्मिक और भावनात्मक स्थिति को और अच्छा करने की कोशिश करी वो ही मनुष्य इस जगत में महान कहलाया और उसका ही नाम युगों-युगों तक अन्यों के लिए प्रेरणा सोत्र बन गया।

जिसका निश्चय दृढ और अटल है,वह दुनिया को अपने सांचे में ढाल सकता है।-गेटे

अर्थात् मनुष्य कोई भी काम जब तक दृढ निश्चयी हो कर नहीं करता तब तक सफल नहीं हो सकता।यदि मनुष्य पूरी मेहनत और ईमानदारी से कोई काम करे तो कोई शक नहीं है कि उस काम में सफल न हो।यदि मनुष्य पूर्ण विश्वास रखे  कि जो काम वो कर रहा है वो सही है तो वो दुनिया को भी इस बात को मानने को विवश कर सकता है।मनुष्य के विश्वास से अन्य मनुष्यों को भी विश्वास होने लगता है और वो भी उसके साथ कंधे से कन्धा मिला कर खड़े हो जाते हैं।इसलिए कहा गया है कि दृढ निश्चय से मनुष्य पहाड़ का सीना भी चीर सकता है।

सबसे बड़ा दोष किसी दोष का भान न होना है।-कार्लाइल

अर्थात् व्यक्ति गलतियों का पुतला है,जाने अनजाने व्यक्ति गलतियाँ करता रहता है।गलतियाँ करने में कोई बुराई नहीं है।अपने दोषों से ही मनुष्य सीखता है।परेशानी तब है जब मनुष्य अपने दोषों को मानने से ही इनकार करने लगता है।जब तक व्यक्ति अपने दोषों को नहीं जानेगा तो वो कैसे जानेगा कि अन्य व्यक्तियों को उनसे कितनी परेशानी होती है और वो कैसे उन दोषों को दूर करने का प्रयास करेगा।इसलिए सबसे बड़ा दोष अपने दोषों का भान न होना है।

सुख और आनंद ऐसे इत्र् हैं,जिन्हें जितना अधिक आप दूसरों पर छिडकेंगे,उतनी ही अधिक सुगंध आपके अन्दर आएगी।-एमर्सन

अर्थात् जब व्यक्ति अपने सुख को दूसरों के साथ साँझा करता है तो उसका खुद का सुख दुगना हो जाता है।जब किसी को ख़ुशी प्रदान की जाती है तो उसके चेहरे पर आनंद के भाव देख कर हमारे चेहरे पर भी ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है और ये आनंद और सुख बयान नहीं किया जा सकता।जो  दूसरों के सुख से सुखी होता है,दूसरों को आनंदित देख कर आनंदित होता है उसका खुद का सुख और आनंद संभाले नहीं संभलता।इसलिए हमेशा दूसरों को आनंदित और सुखी करते रहना चाहिए।