विपरीत परिस्थितियों में या जब कोई हमसे अभद्र व्यवहार करे तो शांत और संयमित कैसे रहा जाए ?:-

जब कभी हमारी कोई इच्छा पूरी नहीं होती या हमारे सामने कोई समस्या,रुकावट अथवा कठिन परिस्थिति आ जाती है तो हम अशांत और असंयमित हो जाते हैं।वहीँ हम तब भी अशांत और असंयमित हो जाते हैं जब दूसरे हमसे अभद्रता का व्यवहार करते हैं अथवा उनके लिए किये गए हमारे अच्छे कार्यों की सराहना नहीं करते हैं।यद्यपि उनके द्वारा की गयी सराहना और सम्मान से हम तुरंत प्रसन्नता का अनुभव करने लगते हैं।क्या यह सही और उचित व्यवहार है ?

नहीं,क्योंकि दोनों ही अवस्थाओं में अशांत और असंयमित होने की जरूरत नहीं है।कठिन परिस्थितियाँ हमें जीवन के अनुभव सिखाती हैं।जिस प्रकार एक पत्थर तरासे जाने के बाद ही शालिग्राम या दिव्य मूर्ति में बदलता है और जिस प्रकार चक्रवात द्वारा ही समुन्द्र के मोती,हीरे आदि जल से निकाल कर तट पर फैंक दिए जाते हैं,उसी प्रकार कठिन परिस्थितियों से निबट कर ही हम परिपक्वता को,अर्थात् दिव्यता और महानता को प्राप्त होते हैं।

जब हम अपने ऊपर आई हुई कठिन परिस्थिति को पूर्व जन्म के कर्मों का फल मान लेंगे या किसी भी घटित घटना को पूर्व-निर्धारित मान लेंगे तो हम ये समझ लेंगे कि पूर्व कर्मों के फल हमें भोगने ही होंगे अथवा पूर्व-निर्धारित घटना तो होगी ही और ये भी समझ लेंगे कि संसार और वक्त प्रतिक्षण बदलता रहता है और आज कठिन परिस्थिति है तो कल अच्छे दिन भी होंगे,तब हम शांत-चित हो जायेंगे।इस प्रकार हम अपना मानसिक संतुलन बनाए रखेंगे और भगवान् में विश्वास रखते हुए और उज्जवल भविष्य की कामना करते हुए देवता स्वरुप हो कर स्वर्गीय शांति और ख़ुशी को अनुभव करेंगे।

वहीँ जब कोई हमसे अभद्रता का व्यवहार करता है तो या तो ऐसा वह ग़लतफ़हमी का शिकार हो कर करता है,या व्यवहार वश ऐसा करता है।जब कोई व्यक्ति अज्ञानतावश ग़लतफ़हमी का शिकार हो कर ये सोचता है कि उसके साथ घटित किसी दुखदायक घटना में हमारा हाथ है और ऐसा सोच कर हमसे अभद्रता का व्यवहार करता है तो हमें अशांत और असंयमित होने की जरूरत नहीं है।क्योंकि न तो ऐसी किसी घटना में हमारा हाथ था जिसके लिए हम ग्लानि महसूस करें और न ही उस व्यक्ति का ही दोष है क्योंकि वो तो ग़लतफ़हमी का शिकार है।अत: ऐसी घटना को व्यर्थ मान कर भुला देना चाहिए।

वहीँ यदि हमारी किसी गलती के कारण किसी का नुक्सान हो गया हो और वो हमसे अभद्रता करता है,तो भी हमें शांत और संयमित हो कर ये सोचना चाहिए कि ऐसा कर के वो हमारे किये गए गलत कार्यों का हमें दंड ही दे रहा है और इसके लिए हमें अशांत और असंयमित होने की जरूरत नहीं है अपितु अपने किये की क्षमा मांगने की जरूरत है।

यदि कोई व्यवहार वश भी हमसे अभद्र व्यवहार करता है तो भी अपना संतुलन खोने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि ऐसा कर के वो अपना ही सम्मान कम कर रहा होता है।जब हम शांत रहते हैं तो अन्य लोग हमारी अच्छाई समझ जाते हैं और हमारा मान-सम्मान बना रहता है पर यदि हम भी उस अभद्र व्यक्ति की तरह हो जायेंगे और अभद्र व्यवहार का उत्तर अभद्रता से देंगे तो उसमें और हम में क्या फर्क रह जाएगा और हम सम्मान के अधिकारी कैसे होंगे।

यदि कोई हमारे द्वारा किये गए अच्छे कृत्यों को नहीं सराहता तो भी हमें अपमानित महसूस कर के अशांत होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि हम अच्छाई प्रतिफल पाने की इच्छा से नहीं करते और जो कार्य प्रतिफल आने की इच्छा से किया जाए वो अच्छा नहीं कहा जा सकता।

हमें खुद को प्रभु का दास मान कर किसी से भी सम्मान की आशा नहीं करनी चाहिए क्योंकि जब हम ऐसी आशा करते हैं तो अपनी शान्ति और संतुलन खो बैठते है।जब कोई हमारा सम्मान करता है तो हम अभिमान के शिकार हो जाते हैं और खुद को बहुत उच्च मानने लगते हैं।जबकि न तो हम किसी के कहने से वैसे बन सकते हैं जैसा वो हमें कहता है और न ही हमें किसी के कहने भर से या आलोचना भर से अपने सिद्धांतों को छोड़ने की जरूरत है।न ही हमें अभिमान करने की जरूरत है।जब हम अपने सिद्धांतों में और खुद में विश्वास बनाये रखेंगे कि जो हम कर रहे हैं सही है और अभिमान का शिकार भी नहीं होंगे तो किसी के कहने भर से अशांत और असंयमित नहीं हो सकेंगे।

इसलिए जरूरत है कि अपनी आत्मा की शुद्धता में और उस परमात्मा के प्रेम में विश्वास बनाये रखा जाए।क्योंकि जब हम खुद को एक आत्मा मानते हैं तो हम पर कठिन परिस्थतियों का और अभद्र व्यवहार का कोई प्रभाव नहीं पड़ता क्योंकि आत्मा के रूप में वो उन परिस्थतियों को और अभद्रता को नहीं स्वीकारता और निर्लिप्त रहता है।इसलिए एक ज्ञानी मनुष्य जानता है कि जो कुछ भी उस के साथ घटित होता है वो एक माध्यम भर है उसे ये सिखाने के लिए कि इस नश्वर जगत का मोह छोड कर सदा सनातन उस प्रभु का ध्यान किया जाए जो हमारा परम मित्र है।अत: वह समभाव रखता हुआ मान-अपमान के चक्कर में न पड़ कर और कठिन परिस्थतियों से न घबरा कर जीवन बिताता है।इस प्रकार वह प्रभु में रमा हुआ शांत और संयमित रहता है।