वैराग्य से मोक्ष प्राप्ति:-
वेदों के अनुसार :-
मनेव् मनुष्यानां कारणं बन्धमोक्षयो:‍।  ‍
 
अर्थात्  मन ही मनुष्यों के बंधन और मोक्ष का हेतु है। शुद्ध मन जिसमें संसार की किसी भी वस्तु से राग नहीं है और संसार में फिर न आने की पक्की धारणा बन चुकी है ,वह मुक्ति का हेतु है ,अन्यथा वाही बंधन का मूल कारण है। मन की इस शुद्ध अवस्था को ही वैराग्य कहते हैं।
अनुशासित मन के द्वारा जीवन मुक्ति प्राप्त कर मनुष्य भवसागर से छुटकारे के अतिरिक्त इंद्रलोक में भी सुख व शान्ति का लाभ प्राप्त कर सकता है। अन्य उपायों के अलावा वैराग्य के द्वारा भी मन पर नियंत्रण किया जा सकता है। किन्तु  प्रश्न उठता है कि गृहस्थ जीवन में घर-बार छोड़ कर भाग नहीं सकते। आज के व्यस्त मशीनी युग मे स्थान-स्थान पर भ्रमण नहीं कर सकते। फिर वैराग्य कैसे हो सकता है ? निराश होने की कोई बात नहीं। यह वैराग्य का सच्चा स्वरुप नहीं है।  यह तो संताप भोगना मात्र है।
भगवान् कृष्ण ने  गीता में कहा है कि :
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहंकारसंयुक्ताः कामरागवलान्विता।।
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवांत: शरीरस्थं तान्विद्यासुरनिश्चयान्।।
अर्थात् जो मनुष्य शास्त्रविधि से रहित केवल मनोकल्पित घोर तप को तपते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त एवं कामना ,आसक्ति और बल के अभिमान से भी युक्त हैं तथा जो शरीर रूप से स्थित भूत समुदाय को और अंतःकरण में स्थित मुझ अंतर्यामी को भी कृश करने वाले हैं ,उन अज्ञानियों को तू आसुरी स्वभाव वाला जान। जो व्यर्थ में भूखा-प्यासा मरता रहता है ,भगवान् उसकी निंदा कर रहे हैं। भूखा मरना केवल भूखा मरने के लिए ,ये कोई व्रत नहीं कहलाता। जिस व्रत या उपवास से शरीर की शुद्धि नहीं होती ,उससे मन का शुद्ध होना भी कठिन है।
प्रायः ऐसे व्रतों से अगले दिन स्वास्थ्य ठीक नहीं मिलता है। अस्वस्थ मनुष्य दुखी होता है। दुःख पाप का फल होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि हमने जो कुछ किया वह पाप के अतिरिक्त कुछ नहीं किया क्योंकि उसके फल से ही तो दुःख भोग रहे हैं।
वास्तव में वैराग्य क्या है ?:
वैराग्य में दो शब्द हैं -‘वै ‘ और ‘राग्य’ । ‘वै ‘ का अर्थ है नहीं  और ‘राग्य ‘ का  अर्थ है राग। राग का भाव है किसी भी पदार्थ  से लगाव ,वह चाहे उसको किसी भी कारण से हो। जिस वस्तु पर हमारा लगाव होगा वही दुःख का कारण होगी।
उदाहण के लिए ,कहीं दूर किसी का पुत्र मृत्यु को प्राप्त होता है। पता लगने पर हम सहानुभूति दिखाने के अतिरिक्त  कुछ नहीं करते। हमें कुछ विशेष दुःख भी नहीं होता। किन्तु यदि अपना कुत्ता भी मर जाए तो अत्यन्त दुःख होता है। वहाँ तो दूसरे का लड़का मरने पर भी दुःख नहीं और यहाँ अपना कुत्ता मरने पर भी महाघोर दुःख होता है। यह भेद क्यों है ?किस बात से है ? यह भेद जिस वजह से है उसे राग कहते हैं। उसके पुत्र में हमारा कोई लगाव नहीं था किन्तु अपने कुत्ते में बहुत लगाव था। इसी कारण हमें दुःख हुआ। इस प्रकार सारे दुखों का कारण हुआ राग। इस राग के न होने की अवस्था को वैराग्य कहते हैं।
यदि मोह -ममता न हो तो घर का कार्य किस प्रकार चल सकता है ?:-
 
जिस प्रकार एक मुनीम दुकान को अपनी न समझते हुए भी सब कार्य ईमानदारी और पूरी निष्ठा से करता है ,एक नर्स बिना किसी रिश्ते के ,रोगियों की सेवा करती है। ठीक उसी प्रकार ,अपना कर्तव्य समझ कर घर के समस्त कार्य किये जा सकते हैं।
यदि हम घर की वस्तुओं को अपनी नहीं समझेंगे और उनसे राग नहीं रखेंगे तो उन्हें कोई भी उठा कर ले जाएगा ?:-
 
सरकारी कार्यालयों में काम करने वाले जानते हैं कि वहाँ उनकी कुर्सियाँ ,मेजें अलमारियाँ ,कागज़ात आदि होते हैं। प्रत्येक कर्मचारी उन्हें अपना मानता है। उन्हें दूसरे कर्मचारियों को लेने भी नहीं देता है। यदि कोई गड़बड़ करता है तो उसकी रिपोर्ट भी करता है। उन वस्तुओं की वह हर संभव उपाय से रक्षा करता है। उनसे काम लेता है किन्तु साथ-साथ यह भी कभी नहीं भूलता कि सारा सामान सरकारी है। मेरा कुछ भी नहीं है।  इसी समझ के कारण रिटायर होने पर उसे  उन सब वस्तुओं को छोड़ने में तनिक भी दुःख नहीं होता। वह यह कभी नहीं सोचता कि मैंने इन  चीजों से इतने दिन काम किया और इसलिए इन्हें घर ले चलूँ। जिस प्रकार हमारा  कार्यालय के सामान के साथ भाव है ,ठीक उसी प्रकार घर-बार सब से यही भाव हो जाए तो समझें कि आप वैरागी हो गए। इसी दृढ़ भावना का नाम वैराग्य है। इस भावना से काम भी चल जाता है और किसी वस्तु से अनावश्यक दुःखमूलक लगाव भी नहीं होता।
जैसे कार्यालय का सारा सामान सरकारी समझ लिया उसी प्रकार घर-बार को भी भगवान का समझ लेना चाहिए। वास्तव में अपना है भी क्या ? न कुछ साथ आया और न कुछ साथ जाएगा। हम से जो प्यार करता है वह अपने सुख के लिए ,हम किसी को चाहते हैं तो स्वार्थ के लिए। कौन दूसरे को उसके लिए चाहता है। यदि कोई चाहता है तो वह भगवान् रूप ही है। सब अपने स्वार्थ को प्रमुखता देते हैं। प्राण निकलने पर उस देह से भी डरते हैं। उसके  मरने पर उसके द्वारा मिलने वाले सुखों के लिए रोते हैं न कि उसके शरीर के लिए। अन्यथा वह शरीर तो वहाँ पड़ा ही था। जब इस संसार में अपना कुछ है ही नहीं और न ही हो सकता है तो फिर किस से मोह-ममता।
याज्ञवल्क्य  जी ने मैत्रेयी से भी यही कहा था कि :
न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति।
आत्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रियाः भवन्ति।।
 
अर्थात्  पुत्रों की कामना के लिए पुत्र प्यारे नहीं होते हैं ,बल्कि आत्मा की कामना अर्थात्  संतुष्टि के लिए पुत्र प्यारे होते हैं।
संसारी पदार्थों में सुख की कामना ,प्राप्त पदार्थों को अपना मानना ,उन के सदा बने रहने के प्रयत्न में परेशान रहना आदि हमारे मन के अशांत रहने के कारण हैं। यदि यह कामना न हो और अहंता ममता से मन ऊपर उठ जाए तो मनुष्य जीवन-मुक्त ही है तथा मरने के बाद उसको मोक्ष प्राप्ति में कोई संशय नहीं है।
गीता के निम्नलिखित श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने इसी बात को स्पष्ट करते हुए कहा है कि :
विहाय कामान्यः  सर्वान्पुमांश्चरित निःस्पृह।
निर्ममो निरहंकारः स शान्तिमधिगच्छति ।।
एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्त विमुह्यति।
स्थित्वास्यामंतकालेपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति।।
 
अर्थात्  जो पुरूष सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग कर ममतारहित हुआ ,अहंकार रहित होकर संसार के कार्य करता रहता है ,वह शान्ति को प्राप्त होता है। हे अर्जुन ! यह ब्रह्म को प्राप्त हुए मनुष्य की स्थिति है। इस को  प्राप्त कर मनुष्य मोहित नहीं होता है और अंतकाल में भी इस निष्ठा में स्थित हो कर ब्रह्मानंद को प्राप्त होता है अथार्थ मुक्त हो जाता है।
सकाम और निष्काम कर्म में भेद :-
मूल रूप से कामनाओं का त्याग इस शरीर के रहते नहीं हो सकता। शरीर की आवश्यकताएँ तो पूरी करनी ही होंगी अन्यथा शरीर की यात्रा भी पूरी नहीं हो सकती। लालसापूर्ण कर्मयोग तो कामना या चाहना कहलायेगाऔर केवल आवश्यकता के लिए कर्म निष्काम कर्म ही कहलायेगा। पहले कर्म का फल बंधन और दुसरे का मोक्ष है।
किसी कवि ने ठीक ही कहा है कि :
चाह गई चिंता मिटी मनवां बे-परवाह।
जिसको कुछ न चाहिए वही शाहों के शाह।।
 
वस्तुतः यह चाह ही तो है जो मनुष्य को संसार में धक्के खिलाती है। जिस को चांदनीचौक से कुछ लेना ही नहीं तो वह वहां क्यों जाएगा ? किन्तु ज़रा भी इच्छा हुई तो सारा शरीर वहाँ पहुँच जाएगा।
वैराग्य से भय की निवृति :-
 
अपने कल्याण की जिस को कामना है उसे इस वैराग्य रुपी रंग में अपने मन को रंग लेना चाहिए और मोक्ष का भागी बनना चाहिए। वैराग्यवान ही निर्भय पद प्राप्त कर सकता है,दूसरा नहीं ,क्योंकि इस संसार में एक ने दूसरे को ग्रस्त कर रखा है।
भर्तृहरि जी का कथन है कि :
आक्रान्त मरणेन जन्म जरसा विदयुचलं यौवनं।
संतॊषी धनलिप्सया शमसुंख प्रौढांगनाविभ्रमै:।।
लोकैर्मत्सरिभिर्गुरणा वनभुवो व्यालैर्नृपा दु्रजनै।
रस्थैर्येण विभूतियोऽप्युपहता ग्रस्तं न किं केन वा।।
 
मृत्यु ने जन्म को ,बुढ़ापे ने यौवन को ,धन की इच्छा ने संतोष को ,स्त्रियों के हाव-भाव ने शांत सुख को ,मत्सर ने गुणों को ,सर्पों ने वन-भूमि को ,दुष्टों ने राजा  को और चंचलता ने धैर्य को ग्रस्त कर रखा है।
भर्तृहरि जी तो यहाँ तक कहते हैं कि हम भोगों को भोग रहे हैं ये भी मिथ्या धारणा है क्योंकि:-
भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्तास्तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।
कालो न यातो वयमेव यातास्तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः ।।
अर्थात्  हमने विषयों को भोगा नहीं उलटे विषयों ने ही हम को भोग लिया ,हम तप न तपे ,पर तप ने हमें तपा दिया और समय नहीं बीता किन्तु हमारी आयु अवश्य व्यतीत हो गयी। किन्तु इतना वृद्ध होने पर भी तृष्णा कम नहीं हुई ,बल्कि हम ही वृद्ध हो गए।
हमारे जीवन में दुखों का मूल कारण:-
हमारे दुखों का कारण इच्छा है। यह हाथ-पैर में रहने वाली नहीं ,वह मन में रहा करती है। जिसका मन शुद्ध हो जाता है उसके मन में संसार की किसी भी वस्तु को और किसी भी अवस्था की कुछ भी कीमत नहीं रहती। वह उसके पाने की कामना भी नहीं करता। केवल आवश्यकता के लिए ग्रहण करता है फिर छोड़ देता है।जब उसकी  दृष्टि में किसी भी वस्तु का मूल्य नहीं रहता तो वह क्यों उन्हें पाने की इच्छा करेगा। जब उसको जीवनकाल में ही कुछ पाने की इच्छा नहीं रहती तो उसे मृत्यु से भी भय नहीं रहता और फिर संसार में आने की लेशमात्र भी कामना नहीं रहती। इस प्रकार ,मन शुद्ध हो कर शांत हो जाता है। कर्मभोग समाप्त होने के बाद फिर उस व्यक्ति को पुनः शरीर मिलने का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। इसी अवस्था का नाम मोक्ष प्राप्ति है।