शिष्य बनो  :-

शिष्य का सामान्य अर्थ होता है –सीखने वाला। गुरू शिष्य की परम्परा प्राचीन काल से ही चली आ रही है।स्वयं भगवान् राम व कृष्ण ने भी गुरुगृह जाकर शिष्य के रूप में शिक्षा ग्रहण की।स्वामी विवेकानंद ,स्वामी दयानंद सरस्वती ,छत्रपति शिवाजी ,संत कबीर आदि महापुरूषों ने गुरू भक्ति ,गुरू सेवा या शिष्य बन कर ही ऐसे कार्य संपादित करे जो अद्भुत ,अतुलनीय तथा वन्दनीय हैं। रामानंद ,विरजानंद ,समर्थ गुरू रामदास तथा रामकृष्ण परमहंस को लोग उतना नहीं जानते जितना कि इनके शिष्यों के बारे में लोगों को ज्ञात है।इसके कई  कारण हो सकते हैं ,परन्तु शिष्यत्व की कसौटी पर खरे उतरने वाले ये शिष्य अपने-अपने गुरूओं से भी गुरुत्तर होते चले गए।

स्वामी विवेकानंद ,स्वामी दयानंद , छत्रपति शिवाजी या संत कबीर बनने से पहले हमें शिष्य बनने के लिए तैयार होना चाहिए।बिना आग पर तपाये, सोने की परख संभव नहीं।हीरे में भी चमक तभी आती है ,जब कुशल कारीगर के हाथों उसे तराशा जाता है।पत्थर भी एक सुन्दर मूर्ति में तभी ढल पाता है जब वह हथौड़ी और छैनी की चोट सहने के लिए स्वयं को प्रस्तुत करता है।अध्यात्म की भाषा में इसी को तप कहते हैं।

तप के कई रूप होते हैं।यह तथ्य गुरू ही जानता है कि शिष्य में किस तप को करने की कितनी पात्रता है।उस पात्रता के अनुसार वह शिष्य को कार्यभार सौंपता है। पतले तारों में उच्च क्षमता की विद्युत् का प्रवाह संभव नहीं।उसी प्रकार शिष्य की पात्रता के अनुसार ही गुरू उसे मार्ग बताते है।यह शिष्य पर निर्भर करता है कि वह गुरू के आदेश का पालन किस हद तक कर पाता है।जिस सामर्थ्य के अनुसार वह गुरू का कार्य ,सेवा करेगा ,उसी के अनुसार उसकी पात्रता बढती जायेगी।अत: शिष्य बनने के लिए अपने आप को भुलाना पड़ता है।इससे कम में काम नहीं चलने वाला है।

मेहँदी पीसने वाले के हाथ तो रंग जाते ही हैं लेकिन यदि उस मेहँदी को कोई सलीके से संवार कर अपने हाथों पर रखता है तो उसके हाथ और भी खूबसूरत लगते हैं।यही परंपरा गुरू-शिष्य परंपरा में दोहराई जाती है।गुरू के जीवन भर के निष्कर्षों को शिष्य अपने जीवन में धारण कर स्वहित तथा परहित के कार्यों को करते हुए उस ऊंचाई का स्पर्श कर पाता है ,जो कि साधारण जीवन में असंभव सी प्रतीत होती है।

प्रत्येक गुरू की यह अपेक्षा होती है कि जीवन में कम से कम वह एक ऐसा शिष्य समाज को दे सके जो उसकी परंपरा को बनाये रख कर समाज को लाभ दे सके।गुरू भक्त शिष्य भी अपने गुरू के इस आशय को ध्यान में रखकर ही अपने जीवन की रणनीति बनाते हैं।बेगारी हाथों में पड कर उन्नतशील बीज भी सड जाते हैं। कुशल हाथों से संरक्षित साधारण बीज भी अपने से सौ गुणा अन्न उत्पन्न करते हैं तथा मालिक को धनवान बनाते हैं।

शिष्यत्व पूरी तरह विकसित हो तभी सच्चा गुरू मिल सकता है।कली के खिलने पर मधुमखियाँ ,भौंरे तथा तितलियाँ स्वयमेव उस पर मंडराने लगते हैं।यदि शिष्यत्व विकसित होने लगेगा तो यह सत्य है कि हिमालयवासी सूक्ष्म सत्ताओं को भी मैदानों में आना पड़ेगा।जब हमारे जीवन में शिष्यत्व आएगा तो हमारी दृष्टि बदल जायेगी तथा हमारे अन्दर वेदों ,उपनिषदों पुराणों की उक्तियाँ अपना मूर्त रूप पाएंगी।योग की परिभाषाएं हम पर पूर्ण रूपेण सही परिभाषित हो जायेंगी।अत: शिष्यत्व का जागरण करो और हे अविनाशी परमात्मा के विनाशी जीव तुम पहले………………………………………………………………………………………. ,शिष्य बनो।