संतुष्ट एवम् खुश रहें:-

खुशी और मस्ती के लिए जीवन कम उम्मीदोंके साथ जीयें ,कभी न भूलें कि हम संसार से खाली हाथ ही जायेंगे इसलिए उस संतोष को जो बुद्धिमानों का गुण है और नकल के लायक है ,उसे अपनाएं और संतुष्ट रहे।

हमारी  एक अच्छी व्यावसायिक और निजी जिन्दगी हो सकती है –अच्छी तनख्वाह ,सुखद परिवार और करीबी दोस्त,पर हम मनुष्य हमेशा असंतुष्ट ही रहते हैं।हम हमेशा वो चाहते हैं जो दूसरों के पास है ,ये भूल कर कि हमारे पास कुछ दूसरा हो सकता है जो ज्यादा बेहतर हो या कुछ ऐसा जो दुसरे व्यक्ति के पास नहीं है और वो चाहता हो। लेकिन इस तरीके से क्यूँ है ?

केवल उन को छोड कर जो विकलांग हैं ,हम सभी को दो हाथ पकड़ने के लिए,दो पैर खड़े होने के लिए ,दो आँखें इस खूबसूरत संसार को देखने के लिए ,दो कान मधुर आवाजें सुनने के लिए ,एक मुख अपनी बात व्यक्त करने  के लिए ,एक नाक खुशबूएं सूंघने के लिए …आदि दिए गए हैं।

पर बड़े अफ़सोस की बात है कि हमारे पास जो है उस की हम सराहना नहीं करते .जबकि निःशक्तजन उन लोगों से जिनके पास ये सभी अंग मौजूद हैं ,ज्यादा प्रसन्न दीखते हैं। वो यह नहीं देखते कि उनके जीवन में क्या गुम है ,बल्कि ये देखते हैं कि समस्या पर कैसे वश किया जा सकता है और ये सब होते हुए भी खुशियों भरी एक पूर्ण जिन्दगी जी जा सकती है। क्या ये ऐसा कुछ नहीं है जो हमें भी आत्मसात कर लेना चाहिए ?

असंतुष्टि एक निरंतर सीधी रेखा के समान है।इस रेखा को रोकना या इसको पलट देना उस व्यक्ति के हाथ में है जो ये रेखा खींच रहा होता है।समान रूप से हमारी भावनाओं,सोच और कर्मों  के साथ भी है। हर एक को ये पता होना चाहिए कि कहाँ रुकना है या कहाँ मुड़ना है।

हर गुजरते दिन के साथ हमारी मांगें बढती जाती है और इच्छायें बदल जाती हैं। जब ये मांगें पूरी नहीं होती ,तो असंतुष्टि का जन्म होता है ,जो आगे चल कर क्रोध,कुंठा और अधीरता का रूप ले लेता है।ये सभी मिल कर बीमारियों और विकारों का रूप ले लेती हैं जो धीरे-धीरे हमारे शरीर की हरेक कोशिका को नुक्सान पहुंचाता है।

अक्सर कारोबारी लोग शिकायतें करते हैं कि हमारा कारोबार ठीक नहीं चल रहा और नौकरीपेशा लोग ही मजे में हैं .क्योंकि उन्हें लगी-बंधी पगार मिल रही है। वहीँ नौकरीपेशा व्यक्ति सोचता है कि मैं तो दास हूँ और मुझे तो केवल एक तनख्वाह में गुजारा करना पड़ता है ,व्यवसाय तो एक विलासिता है। इस प्रकार दोनों अपने-अपने द्वारा किये हुए से संतुष्ट न हो कर दुसरे को देख कर असंतुष्ट हैं।

अधिकाँश व्यक्तियों की विचारधारा ऐसी है कि उनको घास दूसरी तरफ की ही हरी नजर आती है। पर सच्चाई यही है कि केवल वो ही व्यक्ति प्रसन्न है जो केवल उस में ही संतुष्ट है जो उसके पास है। संतुष्टि उसी क्षण हमारे जीवन में प्रवेश कर जायेगी जब हम उन लोगों को देखेंगे जो हमारे जितने भी भाग्यशाली नहीं हैं और उन सब के लिए जो भगवान् ने हमें दिया है ,भगवान् का शुक्रिया अदा करेंगे।

वहीँ दूसरी ओर ,  कृतघ्न व्यक्ति एक बेपेंदी का लोटा है। उसके अन्दर इस विचार के साथ संदेह प्रकट होते हैं कि केवल धनवान लोग ही अपना जीवन आमोद-प्रमोद में जी रहे हैं। जबकि सच्चाई इसके विपरीत है .जितनी ज्यादा हम संपत्ति इकट्ठी कर लेते हैं ,उतना ज्यादा ही हम अपनी मानसिक शांति खो देते हैं ,रातों की नींदें खो देते हैं,तनावग्रस्त हो जाते हैं ,कभी-कभी मानसिक बीमारियों का शिकार भी हो जाते हैं।

हमें हमेशा ये याद रखना चाहिए कि जीवन एक यात्रा है और इसको आश्चर्यजनक और अविस्मरणीय बनाना हमारे ही हाथों में है। यात्रा करना एक सुखद अनुभव तभी होता है जब हम बहुत कम सामान के साथ यात्रा करते हैं .इसी प्रकार से जीवन में यदि हम भौतिक और सांसारिक सुखो के पीछे भागने में व्यस्त रहेंगे ,हमें केवल जीवन की धुंधली दृष्टि ही मिलेगी।

हम ये कटु सत्य भूल जाते हैं और सदा असंतुष्ट रहते हैं कि जीवनके अंतिम पड़ाव पर हमें इस संसार को छोड कर खाली हाथ ही जाना होगा।

हमें अक्सर अपने माता –पिता और बुजुर्गों से सीख मिलती है कि ना आने की ख़ुशी करो ,न जाने का गम अर्थात् कभी भी कुछ नयी आमदनी पर आनंदित न हों और न ही अपनी हानि पर क्रंदन करें।

भगवत गीता के अनुसार,” जो सुख और दुख में सम ,आत्मनिर्भर –जिसके लिए धरती का एक टुकड़ा ,चट्टान और सोना एक समान हैं ,वो हमेशा प्यार करने वालों और न प्यार करने वालो में , निंदा और प्रशंसा में, सम्मान और बदनामी में , दोस्त और दुश्मनमें  सम भाव रखने वाला है ।”

एक काले कौवे ने सफ़ेद हंस को देखा और उसकी इच्छा हुए कि वो भी सफ़ेद रंग का हो जाए। वहीँ दूसरी और हंस दो रंग चाहता था –लाल और हरा बिलकुल तोते की तरह। वहीँ तोता मौर की तरह अनेक रंगों का स्वामी होना चाहता था। त्रासदी यही थी कि केवल कौवा ही स्वतंत्र था जो आकाश में ऊंचा उड़ सकता था। बाकी सभी या तो पिंजरे में कैद थे या चिड़ियाघर में। इस प्रकार कोई भी संतुष्ट नहीं था।सभी एक दूसरे को देख कर असंतुष्ट थे।

संतोष वास्तव में एक गुण है ,जो नक़ल के लायक है। हालांकि लोग इसके लिए पूर्णता की हद तक प्रयास करते हैं पर इसे प्राप्त नहीं कर पाते।

किंग हेनरी VI नाटक में ,विल्लियम शेक्सपियर ने किंग हेनरी से बहुत ही खूबसूरत पंक्तियाँ कहलवाई ,”मेरा मुकुट मेरे हृदय में है नकि मेरे माथे पर ;न ही हीरे जवाहरातों से सजा हुआ और न ही दिखाई देने वाला ,मेरे मुकुट को संतोष कहा जाता है ,ऐसा मुकुट जिसका  राजा कभी-कभी ही आनंद ले पाते हैं। ”

और इन  शब्दों के साथ ही वो अमर हो गया। हालांकि वो अमर नहीं था फिर भी उसके ये शब्द आज तक सभी आयु-वर्गों के पाठकों के दिमागों में गुंजित होते हैं। उन मनुष्यों के विपरीत जो हमेशा असंतुष्ट रहते हैं और हमेंशा चाहते ही रहते हैं।

जैसा कि कहावत है – खुशी और मस्ती के लिए जीवन कम उम्मीदोंके साथ जीयें , साथ कुछ नहीं जाएगा ,खाली हाथ आये थे खाली हाथ जाना है ,इसलिए तृष्णा के पीछे न भागें और याद रखें संतोष एक गुण है जो हर बुद्धिमान के पास है और हमें इसका अनुसरण करना है।