सदःगुण हर किसी से ग्रहण करो:-
चाणक्य के अनुसार अगर हो सके तो विष [ज़हर] में से भी अमृत निकाल लें ,यदि सोना गंदगी मे भी पड़ा हो तो उसे उठाएं,धोएं और अपनाएं ,निचले कुल मे जन्म लेने वाले से भी सर्वोत्तम ज्ञान ग्रहण करें,उसी तरह यदि कोई बदनाम घर की कन्या भी  गुणों  से संपन्न है और आपको कोई सीख देती है तो ग्रहण करें।
इसका अर्थ यह है कि
अमृत हमेशा जीवन देता है ,अथार्थ गुणों की खान है। सोना हमेशा चमकता है। वह बहुत ही कीमती है।अमृत अगर जहर मे भी मिला है तो अमृत है। सोना अगर गंदगी मे भी पड़ा है तो कीमती है।  यहां आचार्य का अर्थ सोने अथवा अमृत से नहीं है। ये तो बस उपमाएं हैं। असल अर्थ तो है कि हमें हर वस्तु,व्यकि को सर्वप्रथम परखना चाहिए और उसके गुण,दोष आदि का अवलोकन करना चाहिए ,न की बिना सोचे समझे कोई राय बनानी चाहिए।  हर एक मे कोई न कोई अच्छाई छुपी होती है। हमें उस को ढूंढ कर निकालना चाहिए।
सज्जन व्यक्ति मे तो गुण मिलेंगे ही लेकिन जरूरी नहीं है कि नीच कुल मे जनम लेने वाला गुणों से हीन हो।  कई बार हम देखते हैं कि जो व्यक्ति हमें सलाह दे रहा है वह बदनाम घर से है ,और हम उसकी सीख को नजरअंदाज कर देते हैं जबकि उसकी सलाह बहुत ही कीमती और सही थी।
कहने का अर्थ ये है की जीवन मे न जाने हमें कितने लोग मिलेंगे ,कितनी तरह की परिस्थितियों  का सामना करना पड़ेगा। कभी हम उन कठिन  परिस्थितियों से डर कर,थक कर बैठ न जाएँ  इसलिए आचार्य ने ये बात कही है। डरने की बजाये यदि हम उन परिस्थितियों से कुछ अच्छा सीख सकें ,आगे के लिए त्य्यार रह सकें, तो कितना अच्छा हो।
जब कोई व्यक्ति हमें गाली देता है तो हम यदि अपने आप को शांत रख पाते हैं तो हमें शांत रहने का गुण मिल जाता है। निचले कुल मे जन्म लेने वाला भी अभावों में रह कर भी उच्च पद को प्राप्त कर सकता है।  कभी कभी पार्क मे ,मंदिर के दिए के तले पढ़ते हुए  कोई बालक अभाव मे रहते हुए भी हमें अपने लक्ष्य से ना हटने और हर परिस्थतियों का सामना करते हुए कर्मयोग की सर्वोत्तम शिक्षा दे जाता है।
अतः जीवन पथ पर आगे बढ़ते हुए ,विभिन् व्यक्तियों से ,परिस्थितियों से सीखते हुए ,सबको समान भाव से देखते हुए ,सदःगुण हर किसी से ग्रहण करते हुए ,अपने लक्ष्य की प्राप्ति की और हम चलें ऐसा आचार्ये चाणक्य का निर्देश था और ऐसा ही मै हम सब के बारे मे सोचता हूँ।