सद्विचार :-

सब जड़ चेतन  वस्तुओं का आदि मूल परमात्मा है। अर्थात् हम सभी उसी परमात्मा की संतान हैं जो आदि है ,सर्वव्यापी है ।वो ईश्वर निराकार,सर्वशक्तिमान,न्यायकारी,दयालु,अजन्मा,सच्चिदानन्दस्वरूप ,अजर,अमर है अतः हमेशा उन को याद रखो। सुख अथवा दुःख  मे ईश्वर को न भूलो।ईश्वर में मन लगाने वाला कभी भी गलत काम नहीं करता।

तुम दूसरों से अपने लिए जैसा बर्ताव चाहते हो वैसा ही बर्ताव तुम दूसरों के साथ करो। यदि तुम चाहते हो कि दूसरे तुम से प्यार करें ,तुमसे सच बोले,तुम्हारी सहायता करें ,तो तुम भी उन से प्यार करो ,उनसे  सच बोलो ,उनकी सहायता करो।

हमें  उस ईश्वर का भी उपकार मानना चाहिए जिसने हमें आँख,कान ,हाथ पैर आदि दिए,धरती ,आकाश,सूरज,चाँद,नदियां ,अन्न ,फल-फूल दिए,सोचने समझने को बुद्धि  दी। हमें उस मातृभूमि का एहसान मानना चाहिए जिस पर हमारा जन्म हुआ,जिसके अन्न-जल से हमारा पोषण हुआ,और हमारे मन मष्तिष्क का विकास हुआ। हमें अपने माता -पिता का उपकार मानना चाहिए जिन्होंने हमें जन्म दिया ,पाल-पोसा ,अच्छे संस्कार ,अच्छी शिक्षा और सद्विचार दिए।

हमें मिल बाँट कर खाना  चाहिए। किसी वस्तु के लिए आपस मे न लड़ो। किसी को अबे ,अरे ,ओ कह कर न पुकारो। बड़ों को आप कहो ,उन्हें दूर  से चिल्ला कर न पुकारो ,इशारे से न बुलाओ। किसी की बात को छुप  कर न सुनो। जल्दी सोऔ  और जल्दी उठो। सत्य बोलो और असत्य का परित्याग करो।

संसार की सामजिक एवं  आत्मिक उन्नति की तरफ तत्पर रहे।जब संसार की सामाजिक उन्नति होगी तभी हमारी भी उन्नति संभव है।वास्तव में केवल अपनी उन्नति तक ही नहीं रहना चाहिए बल्कि सब की उन्नति में ही अपनी उन्नति समझनी चाहिए।

अविद्या का नाश और विद्या की वृद्धि करो। विद्या ही वो रथ है जिस पर सवार हो कर न केवल हम स्वयं की अपितु समस्त मानव जाति और इस प्रकार सम्पूर्ण जगत की उन्नति कर सकते हैं।  अपनी गलतियों को न छुपाएं बल्कि उसे शिक्षा ले कर आगे बढ़ें। अपने दुर्व्यवहार और गलतियों की क्षमा मांगे। क्रोध न करें। उदार बनें।