हम सब अज्ञानता के अन्धकार से घिरे हैं ,ज्ञान उसी में आच्छादित हो जाता है:-

एक राजा था ,वह वेद शास्त्रों  का सुनने वाला था। अपना सुन्दर आदर्श रखता था। उसने एक पंडित जी वेद शास्त्रों को सुनाने के लिए रखे। तब बहुत दिन बाद एक दिन राजा ने प्रश्न किया ,”महाराज ,मुझे कोई ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ और आपको भी ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ क्यों ? इसका उत्तर दीजिये अन्यथा आपकी वृत्ति समाप्त कर दी जायेगी। ”

पंडित जी ने सोचा कि अब वृद्धावस्था आ गयी है क्या किया जाए ? विचार करते हुए चले जा रहे थे तभी एक महात्मा सामने से आते दिखाई दिए। उन्होंने पूछा ,”पंडित जी,क्या चिंता है ?तब पंडित जी ने अपनी व्यथा महात्मा जी को श्रवण कराई और कहा ,”महाराज अब वृद्ध हो गया हूँ ,ऐसी दशा में कहाँ जाऊँगा। ”

तब महात्मा जी ने कहा ,”तुम राजा से जा कर कहो कि मेरे गुरू जी इसका उत्तर देंगे। ”पंडित जी ने कहा ,”मैं यह नहीं कहूँगा। ”तब महात्मा जी ने कहा ,”यह कहना कि तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मेरा शिष्य देगा। ”तब पंडित जी ने राजा से जाकर कहा कि राजा तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मेरा शिष्य देगा।राजा सहमत हो गया।

महात्मा जी राजा के पास आये और बोले कि दो घड़ी का राज्य मुझे दे दो।राजा ने राज्य दे दिया।तब महात्मा जी राजगद्दी पर आसीन हुए और आदेश दिया कि दो मोटे-मोटे रस्से लाओ।तत्काल दो मोटे-मोटे रस्से आ गए। महात्मा जी ने कहा कि एक रस्से से राजा के हाथ-पैर बाँध कर डाल दो और दूसरे से पंडित जी के हाथ-पैर बाँध कर डाल दो। ऐसा ही किया गया।

महात्मा जी ने राजा से कहा कि तुंम पंडित जी के बंधन खोल दो।तो  राजा ने कहा कि मैं कैसे खोल सकता हूँ मैं स्वयं बंधा हुआ हूँ। अच्छा ठीक है। अब महात्मा जी ने पंडित जी से कहा कि तुम राजा के बंधन खोल दो ,तो पंडित जी ने कहा कि मैं कैसे खोल सकता हूँ ,मैं स्वयं बंधा हूँ।तब महात्मा जी ने समझाया कि तुम दोनों ही अज्ञान रुपी रज्जु में बंधे हो ,ज्ञान कैसे हो जाए। राजा की शंका का समाधान हो गया।

इसी प्रकार जो व्यक्ति काम ,क्रोध ,लोभ,माया,ममता ,अहंकार रुपी रस्सी से बंधे हैं अर्थात् उस से लिप्त हैं  उन्हें ज्ञान की प्राप्ति कैसे हो सकती है। अज्ञानी संसारी इस विषय की ओर ध्यान नहीं देते कि समस्त इच्छाओं को छोडना ही ज्ञान प्राप्त करने का और ज्ञानरत रहने का एकमात्र उपाय है।

जब हम वासना ,इच्छा रुपी विकारों का त्याग कर देते हैं तभी कल्याण संभव है। जब ज्ञान की प्राप्ति होती है तभी मोक्ष के द्वार खुलते हैं।जहाँ इच्छाओं का अभाव होता है ,वहीँ ज्ञान संभव है। जब तक माया का आवरण नहीं हटता तब तक जीव भी ब्रह्म में नहीं मिल सकता। अत: अपने ऊपर पड़ा माया का ,अज्ञान का आवरण हटायें और ज्ञान रुपी किरणों का प्रकाश अपने ऊपर पड़ने दें।