ज़रा सोचिये:१

मित्रों अभी कुछ समय पहले का वाकया है।रात का १२ बजे के करीब का समय था।अधिकाँश लोग सो चुके थे।हम भी सोने की तैयारी कर रहे थे।तभी पड़ोस के फ्लैट से जोर-जोर की आवाजें आने लगीं।सोचा पता नहीं क्या हो गया है।जरा स्थिति का पता लगाने की कोशिश की तो पता चला कि एक बहु और उसके ससुर में वाकयुद्ध हो रहा था।बहु चिल्ला रही थी कि उसे और उसके पति को ससुर की जायदाद में से हिस्सा क्यों नहीं मिला।वहीँ ससुर अपना पक्ष रख रहा था।वो कह रहा था कि ये सब तो तुम बच्चों का ही है पर अभी तो मैं जिदा हूँ। बेटा चुप-चाप बैठा था और ये तमाशा देख रहा था और कभी-कभी बीवी का पक्ष ले लेता था।

थोड़ी देर बाद ससुर घर से निकला तो बहु ऊपर से उसे भद्दी-भद्दी गालियाँ दे रही थी।मैं अन्दर आ गया।ये सोच-सोच कर मन खिन्न हो रहा था कि ये वोही ससुर है जो चंद दिन पहले अपने पोतों को बाजार से चीजें ला-ला कर खिला रहा था।

मैं हर बहु-बेटे को,या बेटी-दामाद को खराब नहीं बता रहा हूँ।पर यहाँ एक विचार कौंधा जो मैं आप सब से साझा करना चाहता हूँ।माता-पिता अपने बच्चों को पढ़ा-लिखा कर बड़ा करते हैं,कदम-कदम पर उनको ऊंगली पकड़ कर चलना सिखाते हैं  और वही औलाद,जब माता-पिता बूढ़े हो जाते हैं तो उनके साथ गाली-गलोच करती है।उनसे उनकी जायदाद में हिस्सा मांगती है।

पता नहीं कितनी मेहनत से हमारे-माँ-बाप ने ये जायदाद बनायी होगी।इसमें भी कोई बात नहीं है पहली बात तो ये है जब बच्चों ने ये पैसा नहीं कमाया तो इसे प्राप्त करने में उनका अधिकार कहाँ से आ गया।माता-पिता की चीज है,जिसे चाहें उसे दें,चाहें तो न दें।जितनी दें चाहें दें ,इसमें बच्चों का अधिकार कहाँ है कि मुझे तो इतना ही मिलना चाहिए या मैं तो इतना लूँगा।

हालांकि माता-पिता तो हमेशा ही अपने बच्चों के भले की ही सोचते रहते हैं और उनका सब कुछ वो अपने बच्चों को ही दे कर जाते हैं।किन्तु धन-दौलत को पाने की कुछ बच्चों में इतनी भूख होती है कि वो चाहते हैं कि माता-पिता के जीते-जी ही उन्हें सब कुछ मिल जाए चाहे भले ही बाद में माता-पिता दर-दर की ठोकरें खाएं।

जब बच्चे आपस में माता-पिता की दौलत के लिए लड़ते हैं तो बहुत बुरा लगता है।ऐसे बच्चों से मैं ये पूछना चाहता हूँ कि आप माता-पिता की दौलत के लिए तो लड़ रहे हैं और कह रहे हैं मेरा हिस्सा क्या-मेरा हिस्सा क्या और कभी-कभी कहते हैं मुझे कम मिला मुझे कम मिला या मुझे तो इतना मिलना चाहिए था पर क्या आप कभी इस बात पर भी झगड़ते हैं कि माता-पिता की कौन कितनी सेवा करेगा या माता-पिता की सेवा में मेरा हिस्सा क्या-मेरा हिस्सा क्या और क्या आप कभी ये भी कहते हैं कि मेरे हिस्से में तो माता-पिता की सेवा कम आई,मुझे तो सेवा का इतना हिस्सा मिलना चाहिए था।

जवाब है-नहीं।अधिकाँश बच्चों ने इस दृष्टिकोण से कभी नहीं सोचा।जरा रुकिए और विचारिये माता-पिता के उस त्याग को जो उन्होंने आप को बड़ा करने में किया और फिर निर्णय कीजिये आप को किस बात पर लड़ना चाहिए पैसे में हिस्से के लिए या माता-पिता की सेवा में हिस्से के लिए क्योंकि वो पैसा तो कभी न कभी आप को मिल ही जाएगा पर क्या उनकी सेवा का अवसर आप को हमेशा मिलेगा?

जरा सोचिये……………………………………….!