CONTEMPLATIVE: CHARITY

Penance is destroyed by ego, and by saying here and there, charity become fruitless-Manu

VIZ Ego should never be done by giving donation. You donate, only for the help of someone in need. By giving a donation, and by saying it here and there, you are not only disrespecting the recipient   but you are also becoming victim of ego and are boasting of your power. Such charity is fruitless because, by saying it here and there, you are not only dissatisfying the recipient but yourself also becoming victim of evil. The donation is that, which is given secretly, and which is not only for the benefit of the recipient but also for the benefit of you because you also attain gentleness.

Donator never gets unhappy, he never get engulfed by sins – Rigveda

VIZ The person who donates, when sees someone else happy by his donation, he also receives happiness. He also receives a spiritual peace that he do well for someone and his life succeeded. Thus, his mind becomes cleansed. When his mind is cleansed, no sin can touch him. That is why the person should continue to donate as much as possible.

People who donates get higher positions in heaven-Rigveda

VIZ Those who give donations and Dakshina and help the needy as well, as possible, they always have pure minds. No sin ever touch them. They always become calm, contented and absorbed in the Lord. Simultaneously, they get the blessing of the needy. Those people, who become gentle because of this, are the people who will possess high positions in the heavens.

A little donation given by a happy mind is not too less-Vimanvatthu

VIZ Occasionally, a person lends selfish donation. In reality, many people do not have the desire to donate even although they have the ability to donate. Either do they donate to achieve fame or for selfishness, do so.Some people do donation without any desire. However, they donate too much, but without desire, hence neither the donor nor the recipient become happy. Whereas a  little bit of charity given only with happiness also gives happiness to both the donor and the recipient. Therefore, a little donation given by a happy mind is not too less.

The donation given from the meager also equals the donations of millions of millions – Mahatma Buddha

VIZ Even if the person has a meager of it, but if he has the desire to donate and he donates something out of that little bit, then his donation  equates the donations of those thousand-lakhs, which the wealthy person give from his wealth. It is because ,wealthy people have the power to give and donate and he is donating  but the person who has no such power but still donates and share his meager property to other people so his charity equates the donations of those thousand-lakhs.

विचारणीय:दान

अहंकार से तप नष्ट हो जाता है और इधर-उधर कहने से दान फलहीन हो जाता है-मनु

अर्थात् दान कर के कभी अभिमान नहीं करना चाहिए।आप किसी की जरूरत में उसकी मदद के लिए दान देते हैं।दान दे कर इधर-उधर कहने से न केवल आप दान लेने वाले को बे-इज्जत कर रहे होते हैं वरन स्वयं भी स्वार्थ के शिकार हो रहे होते हैं।इधर-उधर कहने का अर्थ है कि आप अहंकार के शिकार हो रहे हैं और अपनी सामर्थ्य का घमंड कर रहे हैं।ऐसे दान को कोई फल नहीं होता क्योंकि इधर-उधर कह कर आप लेने वाले को भी असंतुष्ट कर रहे हैं और खुद भी बुराई के शिकार हो रहे हैं।दान तो वो है जो गुप्त रूप से दिया जाए और जिससे न केवल पाने वाले का भला हो बल्कि आप भी सज्जनता को प्राप्त हों।

दानी कभी दुःख नहीं पाता,उसे कभी पाप नहीं घेरता–ऋग्वेद

अर्थात् जो व्यक्ति दान देता है वह जब उसके दिए गए दान के द्वारा किसी अन्य को प्रसन्न देखता है तो उसे भी ख़ुशी मिलती है।उसको एक आत्मिक शांति भी प्राप्त होती है कि वो किसी के काम आया और उसका जीवन सफल हो गया।इस प्रकार उसका मन निर्मल हो जाता है।जब उसका मन निर्मल हो जाता है तो उसको कोई भी पाप स्पर्श नहीं कर पाता।इसलिए व्यक्ति को यथा संभव दान करते रहना चाहिए।

जो जन दान-दक्षिणा देते हैं,वे स्वर्गलोक में उच्च स्थान प्राप्त करते हैं-ऋग्वेद

अर्थात् जो जन दान-दक्षिणा देते हैं और यथा संभव जरूरतमंदों की मदद करते हैं वे हमेशा निर्मल मन होते हैं।कोई भी पाप उनके पास नहीं फटकता।वे हमेशा शांत,संतुष्ट और प्रभु में लीन रहने वाले बन जाते हैं।साथ ही साथ उन्हें जरूरतमंदों की आशीष भी प्राप्त होती है।इसी कारण सज्जन हुए वे व्यक्ति स्वर्गलोक में उच्च स्थान के अधिकारी हो जाते हैं।

प्रसन्न चित्त से दिया गया थोडा दान भी थोडा नहीं होता है-विमानवत्थु

अर्थात् कभी-कभी व्यक्ति स्वार्थ वश दान करता है।वास्तव में दान करने की सामर्थ्य होते हुए भी कई व्यक्तियों में दान करने की इच्छा नहीं होती।या तो वे यश प्राप्त करने के लिए दान करते हैं,या स्वार्थ वश ऐसा करते हैं।कई व्यक्ति बेमन से दान करते हैं।हालांकि वे बहुत ज्यादा दान करते हैं किन्तु बेमन से किये जाने के कारण वो दान न तो पाने वाले को खुश कर पाता है और न ही देने वाले को।वहीं प्रसन्नता से दिया गया थोडा सा भी दान,लेने और देने वाले,दोनों को ही प्रसन्न करता है।इसलिए प्रसन्न चित्त से दिया गया थोडा दान भी थोडा नहीं होता।

अल्प में से भी जो दान दिया जाता है,वह सहस्त्रों-लाखों के दान की बराबरी करता है-महात्मा बुद्ध

अर्थात् चाहे व्यक्ति के पास थोडा सा ही हो,पर यदि उसकी दान देने की नियत है और वो उस थोड़े में से भी कुछ न कुछ दान करता है तो वह उस सहस्त्रों-लाखों के दान की बराबरी करता है,जो धन-संपन्न व्यक्ति द्वारा अपनी संपदा में से दिया जाता है।ऐसा इसलिए है क्योंकि धन-संपन्न व्यक्ति की तो देने की सामर्थ्य है और वो दान कर रहा है,पर वो व्यक्ति जिसकी इतनी सामर्थ्य नहीं है पर फिर भी अन्यों को दान दे कर उनके साथ अपनी अल्प संपत्ति बाँट रहा है,अत: उसका दान सहस्त्रों-लाखों के दान की बराबरी करता है।