CONTEMPLATIVE: Fool (stupidity)

The thoughtless man is stupid-Shankaracharya

VIZ Before doing any work or before talking about anything or planning anything, every aspects of it should be discussed. The person who works without thinking is often unsuccessful in that work because he has not already planned to deal with obstacles related to that task. In the same way, after saying without thinking, can often leads to regret later. Sometimes, for these reasons, the person becomes a fool in front of others. Therefore, the person who is thoughtless is called a fool. Hence, before doing anything, think of all your actions and thoughts.

Fools listen to the good-bad sayings of other people and learn evil  things from them, just as the same way, the pig, in spite of having good food in front of them, eats only feces as his feed.-Mahabharat

VIZ The person who cannot learn good things and good qualities from others, he is a fool; it is the same thing that we have luscious food and we still choose the bitter and unsatisfied food. Just as, a pig, despite of having good food in front of him ,eat  feces as his food, in the same way, the person who is a fool, hears the good-bad things of the people and receives bad things from them and eventually go on the path of hell. The person who receives vices and takes the path of hell, instead of becoming a master of the heavens by adopting the virtues, is not the fool, then what else.

Take the loss of hundreds of your own but do not argue, it is the opinion of wise, and to sit in contention without any reason it is a foolish person’s identity-Hitopdesh

VIZ The person who, without any reason, invites the battle and invites the unnecessary tension. If such a person is not a fool, then what else is that? The foolish person, by blaming anyone for no reason, invites the fight. Such a person himself is hitting the ax on his feet and no one likes him. Such people can never grow up in life because they always surround themselves in doubts due to their stupidity and make enemies more than the friends. Whereas wise are those who try to avoid the dispute despite the reasons because Today there may be dispute , but tomorrow there may be some benefit from it . Such person have many friends and everyone likes such person.

A virtuous son is better than hundred foolish sons are. A moon turns away the darkness, which cannot be done by herd of stars –Chanakya

VIZ If the son is of good quality, then he does not only do well for himself but also for the entire family. Under the glow of such a son, all the faults of the family become hidden. The virtuous, enlightened son takes the family’s reputation to the sky. One Such a son is quite enough. Whereas, if the son is stupid, then he will throw the reputation of the entire family into the abyss. If there are innumerable such sons, then in front of a virtuous son, they have no counting. As soon as the moon goes out in the sky then the darkness disappears, but cannot by the light of innumerable stars. Similarly, the glow of a virtuous son is much more than the hundred fool sons.

There is nothing in the world than the foolish, to give grieveness – Yog-vashistha

VIZ The foolish person gets the sorrow. Because of his stupidity, he takes fights with everyone without any reason and makes many enemies. Because of working without thinking anything, he also sees loss in his work. Because of his stupidity, He receives vices and faces the neglect of everyone, finally receive the hell.  That is why no other person is sadder than foolish person in this world.

HINDI TRANSLATION:

विचारणीय:मूर्ख(मूर्खता)

विचार-हीन मनुष्य ही मूर्ख है-शंकराचार्य

अर्थात् किसी भी काम को करने से पहले अथवा कोई भी बात कहने से पहले या कोई भी योजना बनाते समय उसके सभी पहलुओं पर विचार विमर्श कर लेना चाहिए।जो व्यक्ति बिना सोचे विचारे ही कोई काम करता है,वह अक्सर उस कार्य में विफल हो जाता है क्योंकि उसने पहले से ही उस कार्य से सम्बंधित,आने वाली रुकावटों से निबटने की योजना नहीं बनायी होती।उसी प्रकार बिना विचारे ही कोई भी बात मुँह से निकालने के बाद अक्सर उस पर बाद में पछतावा हो सकता है।कई बार इन्ही कारणों से व्यक्ति अन्यों के सामने मूर्ख साबित हो जाता है।इसलिए विचार-हीन व्यक्ति मूर्ख ही कहा जाता है।हमें अपने सभी क्रिया-कलाप सोच विचार कर ही करने चाहियें।

मूर्ख मानव परस्पर बातचीत करनेवाले दूसरे लोगों की भली-बुरी बातें सुनकर उनसे बुरी बातों को ही ग्रहण करता है,ठीक वैसे ही,जैसे सूअर अन्य अच्छी खाद्य वस्तुओं के होते हुए भी विष्ठा को ही अपना आहार बनाता है-महाभारत

अर्थात् जो व्यक्ति दूसरों से अच्छी –अच्छी बातें ,अच्छे गुण नहीं सीख सकता वह मूर्ख नहीं तो और क्या कहा जाएगा।ये तो वही बात हो गयी कि हमारे सामने सुस्वाद भोजन हो और हम फिर भी कडवा और अरूचिकर भोजन ही चुनें।जिस प्रकार सूअर अन्य अच्छी खाद्य वस्तुओं के होते हुए भी विष्ठा को ही अपना आहार बनाता है ,उसी प्रकार जो व्यक्ति मूर्ख होगा केवल वही लोगों की भली-बुरी बातें सुन कर उनसे बुरी बातों को ग्रहण करता है और अंततः पतन को प्राप्त होता है।जो व्यक्ति सद्गुणों को अपना कर स्वर्ग का अधिकारी बनने की बजाय दुर्गुणों को अपना कर नरक का रास्ता पकड़ता है वो व्यक्ति मूर्ख नहीं है तो और क्या है?

अपनी सैंकड़ों की हानि सह ले परन्तु विवाद न करे,यह बुद्धिमान का मत है ,और बिना कारण ही कलह कर बैठना यह मूर्ख का लक्षण है –हितोपदेश

अर्थात् जो व्यक्ति बिना किसी बात के ही अन्यों से लड़ाई मोल ले ले और बेवजह तनाव को निमंत्रण दे ऐसा व्यक्ति मूर्ख नहीं है तो और क्या है?मूर्ख व्यक्ति ही बिना किसी कारण किसी पर भी दोष लगा कर झगडे को बुलावा देते हैं।ऐसे व्यक्ति खुद अपने पैरों पर ही कुल्हाड़ी मारते हैं और ऐसे व्यक्तियों को कोई भी पसंद नहीं करता।ऐसे व्यक्ति जीवन में कभी भी तरक्की नहीं कर सकते क्योंकि अपनी मूर्खता के कारण वे हमेशा शक में घिरे रहते हैं और दोस्तों की अपेक्षा ,दुश्मन ज्यादा बनाते हैं।वहीं बुद्धिमान तो वो है जो कारण होते हुए भी विवाद को टालने की कोशिश करे क्योंकि हो सकता है आज जिस बात के लिए विवाद हो रहा हो उसी के कारण कल कोई लाभ हो जाए।ऐसे व्यक्ति के मित्र ज्यादा होते हैं और उसे हर कोई पसंद करता है।

एक गुणवान पुत्र ही बेहतर है,सौ मूर्ख पुत्र नहीं।एक चंद्रमा सारा अन्धकार दूर कर देता है,जो झुण्ड के झुण्ड तारे नहीं कर पाते-चाणक्य

अर्थात् यदि पुत्र गुणवान हो तो न केवल वो अपना अपितु पूरे कुटुंब का ही भला कर देता है।ऐसे पुत्र की आभा तले कुटुंब के सारे दोष छुप जाते हैं।गुणवान,ज्ञानवान पुत्र परिवार की प्रतिष्ठा आसमान पर ले जाता है।ऐसा एक ही पुत्र काफी होता है।यदि पुत्र मूर्ख हों तो वो समस्त कुटुंब की प्रतिष्ठा रसातल में उतार देते हैं।ऐसे पुत्र यदि असंख्य भी हों तो एक गुणवान पुत्र के आगे उनकी कोई गिनती नहीं है।जिस प्रकार जब आसमान में चाँद निकलता है तभी अँधेरा दूर होता है,न की केवल असंख्य तारों की रोशनी से,उसी प्रकार एक गुणवान पुत्र की आभा सौ मूर्ख पुत्रों के आगे अप्रतिम है।

मूर्खता से बढ़कर अन्य कोई जगत में दुःख देनेवाला नहीं है-योगवसिष्ठ

अर्थात् मूर्ख व्यक्ति ही दुःख पाता है।अपनी मूर्खता के कारण वो सब से बिना कारण झगडा मोल ले लेता है और अनेकों दुश्मन बना लेता है।बिना विचारे काम करने के कारण वो काम में भी हानि का मुँह देखता है।अपनी मूर्खता के कारण वह अवगुणों को अपना लेता है और सभी की उपेक्षा सहता हुआ अंत में नरक को प्राप्त होता है।इसलिए मूर्खता से बढ़कर अन्य कोई जगत में दुःख देने वाला नहीं है।