CONTEMPLATIVE: FRIENDS

हमारा कोई सच्चा मित्र न हो तो जगत निर्जन वन के समान होगा।-बेकन

अर्थात् जीवन में सच्चे मित्रों की परम आवश्यकता होती है।सच्चा मित्र हमारा साथ कभी नहीं छोड़ता।वह हमारी प्रत्येक कठिनाइयों में हमारे साथ खड़ा रहता है।यदि कोई सच्चा मित्र न हो तो हम संसार में खुद को अकेले पायेंगे।ये ठीक ऐसा होगा जैसे हम किसी निर्जन वन में भटक गए हों और कोई भी हमारी सहायता करने वाला न हो।ऐसे व्यक्ति जो हमारे किसी काम नहीं आ सकते या हमारे साथ जरूरत पड़ने पर खड़े नहीं हो सकते,ऐसे व्यक्ति न होने के समान होते हैं।इसलिए यदि सच्चे मित्र न हों तो ये जगत व्यक्तियों के होते हुए भी निर्जन ही लगेगा।

प्राण दे कर भी मित्रों के प्राणों की रक्षा करनी चाहिए।–बाणभट्ट

अर्थात् मित्र की जान सबसे कीमती होती है।क्योंकि मित्र ही हमें सब मुसीबतों से लड़ने में मदद करता है।वो हमारे प्रत्येक दुःख-सुख में हमारे साथ खड़ा रहता है। वक्त-वक्त पर हमें सही सलाह देता है।हमारी गलतियों पर हमें समझाता है और हमें गलतियां करने से रोकता है।इस प्रकार वो हमारे साथ दो जिस्म एक जान होता है।इसलिए मित्र के प्राणों की रक्षा करने का अर्थ है स्वयं के प्राणों की रक्षा करना।अत: प्राण दे कर भी मित्र के प्राणों की रक्षा करनी चाहिए।

उन मित्रों का क्या लाभ,जो हमारी गलतियों के लिए हमें खुल कर और विश्वास के साथ फटकार न लगाएं तथा उनके खतरों के प्रति सावधान न करें।-बेकन

अर्थात् सच्चा मित्र वही होता है जो हमें कोई भी गलत काम करने से रोके।एक सच्चे मित्र का कर्तव्य है कि वो अपने मित्र को ऐसे कामों के प्रति आगाह करे,उसके खतरों के प्रति सावधान करे।यदि हम कोई गलत काम करते हैं तो वो हमें अपना समझ कर डांट लगाए।यदि कोई मित्र ऐसा नही करता और हमारी गलतियों में भी हमें शाबाशी देता रहता है वो वस्तुतः हमारे पतन का कारण ही बनता है।ऐसे मित्र किसी काम के नहीं होते।बल्कि वो मित्र कहलाने के काबिल भी नहीं होते।

दोस्ती ख़ुशी को दूना करके और दुःख को बहाकर प्रसन्नता बढाती है तथा मुसीबत कम करती है।-एडिसन

अर्थात् दोस्त हमारी ख़ुशी में खुश होते हैं।वो हमारी सफलता और ख़ुशी को हमारे साथ मनाते हैं।इस प्रकार हमारी ख़ुशी दोगुनी हो जाती है।इसी प्रकार वो हमारे दुखों को साझा कर उनके भार को कम करने की कोशिश करते हैं।वे हमारे दुखों पर मलहम लगाते हैं।हमें किसी मुसीबत में पड़ने नहीं देते और यदि कोई मुसीबत आ भी जाये तो आधी मुसीबत अपने ऊपर ले लेते हैं।इस प्रकार दोस्ती ख़ुशी को दूना करके और दुःख को बहा कर प्रसन्नता को बढाती है तथा मुसीबत को कम करती है।

मिलने पर मित्र का आदर करो,पीठ पीछे उसकी प्रशंसा करो तथा आवश्यकता के समय उसकी मदद करो।-अरस्तु

अर्थात् मित्र चूंकि हमारी सुख दुःख में हमारे साथ रहता है,मुसीबत में हमारी मदद करता है और हमें सही सलाह देता है,इसलिए हमारे आदर का पात्र है।जब भी हमें हमारा मित्र मिलता है तो हमें उसे पूरा आदर देना चाहिए।जब वो मौजूद न हो तब अर्थात् उसकी पीठ पीछे हमें उसकी भरपूर प्रशंसा करनी चाहिए क्योंकि वो हमारे लिए इतना कुछ करता है।वक्त पड़ने पर मित्र की सहायता अवश्य करनी चाहिए।मित्र भी हमारी जरूरत में हमारी सहायता करते हैं।यदि हम मित्र की जरूरत के वक्त मदद नहीं करेंगे तो उसके मित्र कहलाने के लायक कैसे होंगे।