CONTEMPLATIVE-HAPPINESS

विचारणीय: ख़ुशी (प्रसन्नता):

भार हल्का हो जाता है ,यदि प्रसन्नतापूर्वक उठाया जाए-ओविड

अर्थात् यदि कोई भी काम प्रसन्नता पूर्वक किया जाए तो न केवल उस काम को करने में आनंद आएगा ,बल्कि शांत दिमाग से किये जाने के कारण ,वही कार्य हमें सुगम लगने लगेगा.भारी से भारी काम भी हल्का लगने लगता है ,यदि उसे प्रसन्नतापूर्वक किया जाए .

प्रसन्न रहने के लिए तुम आत्म-विस्मृत हो जाओ,परोपकारी बनो,दूषित विचार को दूर करने का सिर्फ यही एक उपाय है –वुल्वर

अर्थात् जो व्यक्ति केवल अपने बारे में ही सोचता रहता है ,वो कभी भी प्रसन्न नहीं रह सकता .क्योंकि जब व्यक्ति केवल अपने बारे में ही सोचता है ,अपनी ही इच्छाओं की पूर्ति में लगा रहता है तो वो उन के लिए कोई भी अनुचित कार्य करने से भी नहीं डरता .इस प्रकार उसका मस्तिष्क दूषित हो जाता है.बुरे कार्य करने के कारण ,वह हर समय तनाव से घिरा रहता है और उसकी प्रसन्नता नष्ट हो जाती है .वहीं जो व्यक्ति स्वयं को भूल कर परोपकार ही सोचता है वह उत्तम विचारों से भरा रहता है .दूसरों को प्रसन्नता देने के कारण उसके खुद के जीवन में भी प्रसन्नता रहती है .

प्रसन्नता और शोक वास्तव में मन की स्थितियां हैं और मन को वश में रखना अपने हाथ में है-मार्कस औरे

अर्थात् प्रसन्नता और शोक मन की भावनाएं हैं.व्यक्ति अक्सर इन्द्रियों के जाल में फंसा रहता है और इच्छाओं से घिरा रहता है.जब उसकी कोई इच्छा पूरी नहीं होती तो वो शोक में डूब जाता है.जब उसकी कोई इच्छा पूरी हो जाती है तो वो प्रसन्न हो जाता है .पर जिसने अपने मन को काबू में कर लिया हो वह हर अवस्था में एक समान रहता है .न तो कुछ प्राप्त होने से ही उसे अधिक प्रसन्नता मिलती है और न ही कुछ न पाने से उसे कोई शोक होता है .कहने का अर्थ है कि व्यक्ति को अपने मन को वश में रखा चाहिए.

चित्त प्रसन्न रहने से सब दुःख दूर हो जाते हैं.जिसे प्रसन्नता प्राप्त हो जाती है,उसकी बुद्धि तुरंत ही स्थिर हो जाती है-भगवान् कृष्ण

अर्थात् यदि व्यक्ति मन में ठान ले कि वो हर परिस्थिति में प्रसन्न रहेगा तो उसे दुःख का अनुभव नहीं होगा .जो व्यक्ति दुखी रहता है उसका मन अस्थिर रहता है .ऐसा व्यक्ति हमेशा तनाव से भरा रहता है और उसका मस्तिष्क स्थिर हो कर नहीं सोचता .यदि व्यक्ति प्रसन्नता से भरा है तो वह शांत रहेगा और सभी कार्य सोच विचार कर करेगा अर्थात् उसकी बुद्धि स्थिर रहेगी.

प्रसन्नता परमात्मा की दी हुई औषधि है-स्वेट मार्डन

अर्थात् प्रसन्नता एक औषधि के समान है .जो व्यक्ति प्रसन्न रहता है उसे कोई भी बिमारी नहीं घेरती .उसका मस्तिष्क शांत रहता है और बुद्धि स्थिर.कोई भी काम उसके लिए कठिन नहीं होता इसलिए उसे कभी भी तनाव नहीं घेरता .शांत होने के कारण ऐसा व्यक्ति बुरे कामों में नहीं पड़ता .इस प्रकार प्रसन्न व्यक्ति एक स्वस्थ जीवन जीता है .जब व्यक्ति परोपकार के काम करता है ,प्रभु भक्ति में लगा रहता है ,तो उसका मन प्रसन्नता से भरा रहता हे .इसलिए प्रसन्नता परमात्मा की दी हुई औषधि है .