CONTEMPLATIVELiberation (salvation):

The meaning of salvation is to be free. Here is the question, from whom? The answer is clear that to be free of grief means salvation. Where there is no bond, there is no liberation. Life is bound; therefore, it needs liberation – Swami Dayanand

VIZ When we lose our bonds that we ourselves tied ,then we can say that we are free. These bonds are attachment, greed, bad karma, dissatisfaction etc. If not all these are within anyone then that person is free and therefore there is no need for him to be free. However, soul, due to living in this body, accepts the body everything and being constantly tied to this body. It continuously trying satisfying his senses and acts unrighteous. That is why it is necessary for the soul, to become free and understand that he is not the body but only the soul, which is a part of the divine God and for the sake of Paramartha, has been manifested in this world.  Only by knowing this, salvation is possible.

There is no other way to get salvation without knowledge of God – Swami Dayanand

VIZ When we acquire knowledge of God, then we know that whatever happens in this world, its doer is God Himself. When we begin to obey this thing, we avoid the vanity of vain that we are the doer of whatever work is going on. When no pride remains in a person, then he starts seeing all of them in one way. Thus, he starts walking on the path of liberation as shown   by the Lord. A person full of virtues can attain liberation soon. That is why it is said that there is no other way to get salvation without knowledge of God.

It is liberation to take karmas from self-interest to charity, liberation from karma is not liberation – Rabindranath Thakur

VIZ Karma should always be done. Even if one leaves his karma and becomes a Sanyasi, then also he does not get salvation. He may get liberation from karma but he cannot get rid of this Bhavsagar. Even if the person is entangled in selfishness, even then salvation is not possible. Only the deeds done for themselves, takes the person to attachment. The person remains in the desire for more and thus remains the slave of the senses. The person who does his karma for charity can go towards liberation, because the karma done for the charity  not only gives pleasure and pleasure to others but also brings satisfaction and virtues in the life of the doer,  which  are essential elements for salvation.

Salvation does not be found placed in any place nor we need to go to another village to find it. Salvation is the destruction of the ignorance gland.-Shivageeta.

VIZ When a person destroys the feeling of attachment hidden within the heart, and  attempts to overcome all the defects in him, only then ,he attempts to move towards the direction of salvation. When a person is undergoing the knowledge only then does he know that with worldly things, the temptation with the people is useless. This is the bond that does not allow it to be free. In addition, the weaknesses within him are not letting him go in the direction of salvation. When he realizes that only the work done for the service of others can lead him to liberation, and at the same time, he can break the bondage of attachment, only then can he attain salvation. All this is possible, when the knowledge germinates in his heart .It is said that salvation is present within us only and we do not need to wander around in search of it.

The name of lust decay is salvation and that is called life-liberation – Shankaracharya

VIZ Name  to be free from bondage is called salvation. Bondages are, lust, longing, desires which are present with in us. Because of all these, we always drowning in lust and always think about self-satisfaction and always do improper works. Whereas, when we are able to kill existing desires within us then we are able to put ourselves in the service of good works and humankind and this is our first step towards salvation .This is called life-salvation, where person is having no desire and he will   be exempt from life cycle.



मुक्ति शब्द का अर्थ छूटना है।यहाँ प्रश्न होता है,किससे छूटना?उत्तर स्पष्ट है कि दुःख अर्थात् बन्धनों से छूटना मुक्ति है।जहां बंधन नहीं,वहाँ मुक्ति भी नहीं।जीवात्मा बद्ध है,इसलिए इसको मुक्ति की आवश्यकता है–स्वामी दयानंद

अर्थात् जब हम अपने बन्धनों से,जो कि हम ने स्वयं ही बांधे होते हैं,छूट जाते हैं तो हम कह सकते हैं कि हम मुक्त हो गए हैं।ये बंधन हैं- आसक्ति,मोह,लोभ,लालच,बुरे कर्म,असंतुष्टि आदि।यदि ये सब किसी के भीतर न हों तो वो व्यक्ति तो मुक्त ही है और इसलिए उसे मुक्त होने की कोई आवश्यकता नहीं है।किन्तु जीवात्मा इस शरीर को धारण कर शरीर को ही सब कुछ मान लेता है और निरंतर इस शरीर से बंधा हुआ इसकी तुष्टि में लगा रहता है और अधर्मपूर्ण कार्य करता रहता है।इसलिए जीवात्मा को मुक्त होने और ये समझने की आवश्यकता है कि वो कोई शरीर नहीं है बल्कि आत्मा है जो परमात्मा का ही अंश है और परमार्थ के लिए ही इस जगत में अवतरित हुआ है।ऐसा जान कर ही बद्ध जीवात्मा की मुक्ति संभव है।

परमेश्वर के ज्ञान बिना मुक्ति पाने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है-स्वामी दयानंद

अर्थात्  जब हम परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं,तो जान जाते हैं कि जो कुछ भी इस संसार में घटित होता है,उसका कर्ता स्वयं भगवान् ही है।जब हम इस बात को मानने लग जाते हैं तो हम व्यर्थ के दंभ से बच जाते हैं कि जो भी कार्य हो रहा है उसके कर्ता हम हैं।जब व्यक्ति को कोई अभिमान नहीं रहता तब वह सब को समान दृष्टि से देखने लग जाता है।इस प्रकार वो प्रभु के बताये मुक्ति के रास्ते पर चलने लग जाता है।सद्गुणों से  भरा हुआ व्यक्ति शीघ्र ही मोक्ष को प्राप्त होता है।इसलिए कहा गया है कि परमेश्वर के ज्ञान के बिना मुक्ति पाने का कोई दूसरा मार्ग नहीं है।

कर्म को स्वार्थ की ओर से परमार्थ की ओर ले जाना ही मुक्ति है,कर्म का त्याग मुक्ति नहीं है-रविन्द्रनाथ ठाकुर

अर्थात् कर्म हमेशा करते रहना चाहिए।व्यक्ति अपना कर्म छोड़ कर सन्यासी बन जाए तो भी उसे मुक्ति नहीं है।उसे कर्म से भले ही मुक्ति मिल जाये पर उसे इस भवसागर से मुक्ति नहीं मिल सकती।वहीँ यदि व्यक्ति स्वार्थ में ही उलझा रहेगा तो भी मुक्ति संभव नहीं है।केवल अपने लिए किये गए कर्म,व्यक्ति को आसक्ति की ओर ले जाते हैं।व्यक्ति और अधिक की चाह में ही रहता है और इस तरह इन्द्रियों का गुलाम बना रहता है।जो व्यक्ति अपने कर्म परमार्थ के लिए करता है,वही मुक्ति की ओर जा सकता है क्योंकि परमार्थ के लिए किये गए कर्म न केवल दूसरों को सुख और आनंद देते हैं बल्कि करने वाले के जीवन में भी संतोष और सद्गुणों का संचार करते हैं जो मोक्ष प्राप्ति के लिए जरूरी तत्व हैं।

मोक्ष किसी स्थान पर रखा हुआ नहीं मिलता और न उसको ढूँढने के लिए किसी दूसरे गाँव को ही जाना पड़ता है।हृदय की अज्ञान ग्रंथि का नष्ट होना ही मोक्ष कहा जाता है-शिवगीता

अर्थात् जब व्यक्ति हृदय के भीतर छुपे आसक्ति के भाव को नष्ट कर देता है,अपने भीतर के सभी दुर्गुणों को पहचान कर दूर करने का प्रयास करता है,तभी वो मोक्ष की दिशा में कदम बढ़ाता है।जब व्यक्ति के भीतर ज्ञान का संचार होता है,तब ही वो जान पाता है कि सांसारिक वस्तुओं से,व्यक्तियों से मोह व्यर्थ है।यही वो बंधन है जो उसे मुक्त नहीं होने देता।साथ ही साथ उसके भीतर के अवगुण भी उसे मुक्त नहीं होने दे रहे हैं।जब वो जान जाता है कि दूसरों के सेवार्थ किये गए कार्य ही उसे मोक्ष की ओर ले जा सकते हैं और साथ ही साथ वो मोह रुपी बंधन को भी तोड़ पाता है,तब ही वो मोक्ष पा सकता है।ये सब उसके हृदय में उपजे ज्ञान द्वारा ही संभव है।इसलिए कहा गया है कि मोक्ष तो हमारे भीतर ही मौजूद है।उसके लिए इधर-उधर भटकना नहीं पड़ता।

वासना-क्षय का नाम ही मोक्ष है और यही जीवन्मुक्ति कहलाती है-शंकराचार्य

अर्थात् बन्धनों से मुक्त होने का नाम ही मोक्ष है।बंधन हैं-हमारे भीतर मौजूद चाह,लालसा,वासना और विभिन्न प्रकार के दुर्गुण।इन्ही के कारण हम अनेकों प्रकार के व्यसनों में डूबे सदा स्वार्थ की ही सोचते रहते हैं और सदा अकर्मनीय कर्म करते रहते हैं।वहीँ जब हम अपने भीतर मौजूद वासना,लालसा,चाह को ख़तम कर पाते हैं तो हम खुद को अच्छे कार्यों और मानवमात्र की सेवा में लगा पाते हैं और यही मोक्ष की तरफ हमारा पहला कदम होता है और यही जीवन्मुक्ति कहलाती है।जहां व्यक्ति इच्छा रहित हुआ जन्म –मरण के चक्र से छूट जाता है।