COTEMPLATIVE 62 – TO CONQUER OUR DESIRES

विचारणीय:62 इच्छाएं/ इच्छाओं पर विजय

सभी इच्छाएं मन में ही उत्पन्न होती हैं,इसलिए श्रेष्ठ पुरूष वे हैं जो मन पर काबू पा लेते हैं।-एतरेय आरण्यक

अर्थात्  हमारा मन ही है जो नित्य चलायमान रहता है।तरह–तरह की इच्छाएं करता है और उन इच्छाओं की पूर्ति की खातिर भटकता रहता है।उन इच्छाओं की पूर्ति के लिए गलत और अशोभनीय कर्म भी करता है।इस प्रकार वो व्यक्ति दुर्गुणों से युक्त हुआ नीचता को प्राप्त होता है।पर जिसने अपने मन को काबू में कर लिया,वो इन इच्छाओं का गुलाम नहीं बनता।वह अपने गुणों को नहीं त्यागता और सज्जनता से भरा हुआ श्रेष्ठ पुरूष कहलाता है।श्रेष्ठता उसी में है कि मनुष्य सत्कर्म करे और सद्गुणों से भरा रहे।मन को काबू में रखने वाले व्यक्ति के पास ये दोनों ही बातें होती हैं।

बसंत का आनंद वही उठा सकता है जिसने पतझड़ देखा है।-शेक्सपियर

अर्थात् जब तक हम कठिनाइयों का स्वाद नहीं चखेंगे तब तक हमें आराम का मजा कहाँ आयेगा।सोना भी आग में तप कर ही कुंदन  बनता है।जिसके जीवन में दुःख और संकट आये हों वो जब उन से घबराता नहीं और आगे ही बढ़ता जाता है और सफलता का स्वाद चखता है तो उसे परिश्रम,त्याग और तपस्या से पायी हुई सफलता दूना आनंद प्रदान करती है।खाने का स्वाद भी वही उठा सकता है जो वाकई भूखा हो।जब व्यक्ति तृप्त हो तो उसे खाने में स्वाद कैसे आ सकता है।ठीक इसी प्रकार जिसको बसंत अर्थात् सफलता आसानी से मिल गई हो उसे उस सफलता का उतना आनंद नहीं मिलेगा जितना आनंद उस व्यक्ति को मिलेगा जो पतझड़ अर्थात् दुःख,परेशानियों से हो कर वहां तक पहुंचा हो।

सौभाग्यशाली वह है जो किसी चीज की आशा नहीं करता क्योंकि उसे कभी निराश नही होना पड़ता।–अलेग्जेंडर

अर्थात् जब व्यक्ति किसी चीज की कामना करता है और उसे वो चीज नहीं मिलती तो वो अपने आप को बहुत ही दुर्भाग्यशाली समझने लगता है।पर जरूरी तो नहीं कि हमें सभी इच्छा अनुरूप मिले।पर जो व्यक्ति अपने मन को काबू में कर लेता है,उसके मन में कोई इच्छा,किसी चीज की आशा नहीं रहती और इस प्रकार उसे जब कोई वस्तु नहीं मिलती तो वह निराश नहीं होता क्योंकि उसने तो किसी चीज की आशा ही नहीं की थी।इसलिए सबसे सौभाग्यशाली व्यक्ति वे होते हैं,जिन्होंने अपने मन को काबू में कर के अपनी समस्त इच्छाएं और आशाएं त्याग दी हैं और जो जैसा और जिस रूप में मिलता है उसी में संतुष्ट रहते हैं।

जिसने अपनी इच्छाओं पर विजय पा ली है और जो अपने कर्तव्य से विचलित नहीं होता,उसकी आकृति पहाड़ से भी बढ़कर रौबदाब वाली होती है।-तिरुवल्लुवर

अर्थात् ऐसा व्यक्ति जिसकी कोई इच्छा नहीं होती अर्थात् जिसने अपने मन को,अपनी इन्द्रियों को काबू में कर लिया है वो कभी भी अपने लक्ष्य,अपने कर्तव्य से भटकेगा नहीं,क्योंकि हमारी इन्द्रियां ही हैं जो हमें विषय-वासना के जाल में फंसा कर हमारे लक्ष्य से भटका देती हैं।इस प्रकार का व्यक्ति कभी भी किसी से नहीं डरता क्योंकि उसने जीवन में कभी भी गलत काम नहीं किया होता।व्यक्ति गलत काम तब ही करता है जब वो अपनी इन्द्रियों का गुलाम हो।जब व्यक्ति किसी से नहीं डरता और सच्चाई के रास्ते पर अडिग खड़ा रहता है तो उसके व्यक्तित्व में एक रौब,एक चमक आ जाती है और ऐसे व्यक्ति के आगे सर झुकाने को और उस जैसा बनने का मन करता है,अर्थात् ऐसे व्यक्ति की आकृति पहाड़ से भी बढ़कर रौबदाब वाली होती है।

जो हम चाहते हैं,वह मिल नहीं पाता और जो मिल जाता है वह हमारे चाहने के अनुकूल नहीं होता,इसलिए हम अनावश्यक दुखी होते हैं।-रामलाल

अर्थात् व्यक्ति के सभी दुखों का कारण उसका इन्द्रियों में लिप्त होना है,जो व्यक्ति के भीतर तरह-तरह की इच्छाएं जगा देती हैं और जब व्यक्ति की यही इच्छाएं किसी कारणवश पूरी नहीं हो पाती अथवा मन के मुताबिक़ नहीं हो पाती तो व्यक्ति दुखी हो जाता है।क्योंकि जरूरी नहीं है कि जो व्यक्ति चाहे वो उसे मिल जाए और ये भी जरूरी नहीं है कि जो उसे मिले वो उसके चाहने के अनुकूल हो।इसलिए अपने मन को सदा काबू में रखना चाहिए ताकि व्यर्थ की इच्छाएं इसमें जागृत न हो सकें और उसे अनावश्यक दुखी न होना पड़े।