HOW TO LIVE LIFE :18

Lookup within yourself: 3

When a person lookup within himself and spends time with himself, then his heart’s disorders gets destroyed and his heart is filled with love and compassion.

Love is such a feeling which teaches people to take care of each other and to do such things which are beneficial for everyone. The person has forgotten the basic purpose of life in the busyness of today, which is -to live a blissful life, while having love and compassion in heart.

Bhagwat Gita also states that the ultimate and only purpose of a person’s life is to be absorbed in God Himself. When a person fills his heart with love and compassion, it is possible to do so.

When there is love in a person’s heart, he comes automatically in the state of never ending bliss. Where there is true love, the other virtues, such as truth, justice, courage, kindness, compassion, automatically starts staying there.

When the person stays awakening within himself and makes his entire consciousness introspective, then he realizes the truth of his soul. When he realizes the truth of the soul, then he realizes that every person is equal and the part of Divine Spirit only.

By having this type of thinking, a sense of infinite love is born in it. He learned to control his emotions and thoughts and to inspire him towards goodness. Thus, all the disorders and negative qualities within the individual are destroyed.

The ultimate goal of life, the only solution to meet that God, is to purify own soul. And this is possible only if a person turns his consciousness from outward to inward and spend precious time with himself.

Thus, by peeping within yourself, the feeling of hatred towards others, which can happen within the person, is destroyed. The person starts to feel this hatred redundant and he realizes that this hatred not only polluted his heart It was also affecting his personality.

Thus, by peeping within himself, the person can not only make his personality pure, but also pure his soul. Thus, by developing inner beauty instead of exterior beauty, he will not only make the world worth living, but his ultimate goal, which is to attain spirituality, will also be achieved.

HINDI TRANSLATION: हिंदी अनुवाद

जीवन कैसे जीयें:१८

स्वयं के भीतर झांकें:३

जब व्यक्ति स्वयं के भीतर झांकता है और स्वयं के साथ वक्त बिताता है तो उसके हृदय के विकार नष्ट हो जाते हैं और उसका हृदय प्रेम और करुणा से भर जाता है।

प्रेम ऐसी भावना है जो व्यक्तियों को आपस में एक दूसरे के प्रति परवाह करना और ऐसे काम करना जिनसे सबका भला हो,सिखाती है।व्यक्ति आज की व्यस्तता में जीवन का मूलभूत उद्देश्य भूल गया है,जो है–हृदय में प्रेम और करुणा लिए आनंदमय जीवन जीना।

भागवतगीता में भी लिखा है कि व्यक्ति के जीवन का अंतिम और एकमात्र उद्देश्य है उस परमपिता परमेश्वर में लीन हो जाना।जब व्यक्ति अपने हृदय को प्रेम और करुणा से भर लेता है तब ऐसा हो पाना संभव है।

जब किसी व्यक्ति के हृदय में प्रेम होता है तो वह कभी भी ख़त्म न हो सकने वाली परमानंद की अवस्था में स्वयमेव आ जाता है।जहाँ सच्चा प्रेम होता है वहाँ अन्य सद्गुण जैसे सच्चाई,न्यायप्रियता,हिम्मत,दया,करुणा आदि भी निवास करने लगते हैं।

जब व्यक्ति प्रतिक्षण स्वयं के भीतर झांकता है और अपनी सम्पूर्ण चेतना अन्तर्मुखी कर लेता है तो वह उसकी आत्मा की सच्चाई को जान लेता है।जब वह आत्मा की सच्चाई को जान लेता है तो उसे समझ आ जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति एक समान है और उस दिव्य परमात्मा का ही अंश है।

इस प्रकार के विचार करने से उसके भीतर एक असीम प्रेम की भावना जन्म लेती है।वह अपनी भावनाओं और विचारों को नियंत्रित करना और उन्हें अच्छाई की ओर प्रेरित करना सीख जाता है।इस प्रकार व्यक्ति के भीतर के सभी विकार और नकारात्मक गुण नष्ट हो जाते हैं।

जीवन के परम लक्ष्य,उस परमपिता परमेश्वर से मिलन का एकमात्र उपाय यही है कि व्यक्ति स्वयं की आत्मा को शुद्ध करे।और ऐसा तभी संभव है जब व्यक्ति अपनी चेतना को भीतर की ओर मोडे और स्वयं के साथ कीमती वक्त बिताये।

इस प्रकार स्वयं के भीतर झाँकने से दूसरों के प्रति घृणा की भावना जो व्यक्ति के भीतर हो सकती है,उसका नाश हो जाता है।व्यक्ति को ये घृणा बेमानी लगने लगती है और वो जान पाता है कि ये घृणा न केवल उसके हृदय को प्रदूषित कर रही है बल्कि उसके व्यक्तित्व को भी प्रभावित कर रही थी।

इस प्रकार स्वयं के भीतर झाँक कर व्यक्ति न केवल अपने व्यक्तित्व,बल्कि अपनी आत्मा को भी शुद्ध और सुन्दर बना सकता है।इस प्रकार बाहरी सौन्दर्य की बजाय भीतरी सौन्दर्य को विकसित कर वो न केवल विश्व को रहने लायक बना पायेगा अपितु अपने परम लक्ष्य प्रभुप्राप्ति को भी हासिल कर सकेगा।………………..क्रमशः