HOW TO LIVE LIFE: BE COMPASSIONATE:4

जीवन कैसे जीयें:दया और प्रेम:४

जब तक हम संवेदनशील नहीं होंगे तब तक न तो हम मनुष्य हैं और न ही दयालू क्योंकि सर्वप्रथम और सबसे महत्वपूर्ण विशेषता जो मानव जाति के लिए आवश्यक है ,वो है संवेदनशील होना ,करुणामय होना.

संवेदनशीलता एक विशेषता है जो व्यक्ति में सकारात्मक तरंगें पैदा करती हैं और इस प्रकार व्यक्ति के अन्दर दूसरे के दुःख-दर्द में सहभागी बनने और उसे दूर करने का प्रयास करने करने के लिए ,इच्छा पैदा करती है .

संवेदनशीलता और करुणा ,प्यार,सहानुभूति और दूसरों की मदद करने की इच्छा रखने का मिश्रण है .और जो व्यक्ति करुणामय होता है ,वो दूसरों की परेशानियों को,कठिनाइयों को,दुःख-दर्द को दूर करने के लिए ,किसी भी परेशानी को स्वयं उठाने के लिए तैयार रहता है .और ऐसे व्यक्ति ऐसा करते वक्त ,ये नहीं सोचते कि वे किसी को अनुग्रहित कर रहे हैं ,अपितु ऐसा करना वे अपना कर्तव्य समझते हैं ,जो उनको असीम संतुष्टि और ख़ुशी प्रदान करता है .

जब आप गिरते हुओं को थामते हैं ,तब आप पाते हैं कि न केवल अन्यों की जिन्दगी में महान बदलाव हो रहे हैं बल्कि आप की स्वयं की जिन्दगी में परिवर्तन हो रहे हैं.

हालांकि आजकल की भागदौड और प्रतिस्पर्धा से भरी जिन्दगी में ,हम में से अधिकाँश ,एक दयालुतापूर्ण शब्द,एक मुस्कराहट से भरे चेहरे और एक परवाह करने वाले हाथ का जादू समझने में विफल रहते हैं .एक दूसरे से आगे निकलने की हौड में ,हम ये समझ नहीं पाते कि एक छोटा,दयालुताभरा और करुणामय व्यवहार भी ,जो हम किसी जरूरतमंद को दे सकते हैं ,वो उसके जीवन के दुखों,तकलीफों से उभरने में ,उसकी कितनी मदद कर सकता है .और ऐसा करने में हमारी एक पाई भी खर्च नहीं होती.

यदि आज के युग में ,शांति और तरक्की की कमी है तो केवल इसलिए कि हममें करुणा की कमी है और हम एक दूसरे के खून के प्यासे हैं .मदर टेरेसा के शब्दों में यदि हमारे अन्दर शान्ति नहीं है तो केवल इसलिएकि हम ये भूल चुके हैं कि हम एक दूसरे से सम्बद्ध हैं .

आपस में करुणामय रहना और एक दूसरे के प्रति दयालु रहना ही वास्तव में संसार को स्वर्ग बनाता है और उसमें रहने वाले हम सभी को आनंदमय बनाता है और परमानंद का अधिकारी भी बनाता है.