HOW TO LIVE LIFE: BE HAPPY & SPREAD HAPPINESS:5

खुश रहें और ख़ुशी फैलाएं :५

जीवन ,व्यक्ति को,अच्छे और बुरे ,दोनों तरह के अनुभव देता है .अधिकांशत ,व्यक्ति ,बुरे अनुभवों को ,शिद्दत के साथ ,याद रखता है .जब कभी,व्यक्ति, अपनी किसी पुरानी असफलता,अपमान या तिरस्कार को याद करता है ,तो उसकी ,शान्ति और ख़ुशी ,क्षण में काफूर हो जाती है .उस क्षण ,कोई भी अच्छे अनुभव की यादें ,व्यक्ति को,उस अवस्था से ,बाहर नहीं ला पातीं.

इस प्रकार,जब भी कोई नकारात्मक घटना ,व्यक्ति के जीवन में होती है तो व्यक्ति उस पर ही केन्द्रित हो जाता है और यही बुरे अनुभव और नकारात्मक सोच,व्यक्ति के भीतर ,दुःख और अवसाद के कारण बन जाते हैं.

हालांकि ,ख़ुशी यहीं है,पर ,व्यक्ति को स्वयं के मस्तिष्क को इतना प्रशिक्षित करना होगा कि वह सकारात्मक सोच रख सके और प्रसन्न रह सके.जब व्यक्ति स्वयं के भीतर झांकता है और आत्मज्ञानी बन जाता है तो वह नकारात्मक सोचों को खुद से दूर कर लेता है और हर क्षण ,जीवन के सकारात्मक पहलुओं पर ही ध्यान रखता है,क्योंकि वो जानता है कि ये संसार सकारात्मकता से भरा हुआ है .इस प्रकार से प्रशिक्षित मस्तिष्क,जो उत्तम और अच्छी बातों पर केन्द्रित रहता है ,वह कुंठा से दूर रहता है और हमेशा खुश रहता है .

जब व्यक्ति अहं से मुक्त हो जाता है ,तो वो आत्मज्ञानी बन जाता है .आत्मज्ञानी व्यक्ति जानता है कि वह केवल आत्मा है और जो कुछ भी उसके द्वारा किया जा रहा है ,वह केवल निमित है और उसका कर्ता तो वास्तव में प्रभु ही है .इस प्रकार ,वह कभी भी अहं का शिकार नहीं होता .

इस प्रकार ,अहंकार रहित व्यक्ति ,सकारात्मक ऊर्जा से भर जाता है .इस प्रकार व्यक्ति,ध्यान,तप के द्वारा ,स्वयं के भीतर झाँक कर और आत्मज्ञानी हो कर ,खुद को फिर से जागृत कर सकता है और स्वयं में परिवर्तन ला सकता है .

जब व्यक्ति आत्मज्ञानी हो जाता है तो वह ,लाभ-हानि ,जय-पराजय में सम भाव रखने लगता है और जानता है कि वह आत्मा है और इस संसार में निमित्त के रूप में कर्तव्य निर्वाह के लिए आया है .वो ये भी जानने लगता है कि उसके द्वार किये गए कृत्य ही ,उसका भविष्य निर्धारण करेंगे और इस प्रकार वो खुद को शिकार के रूप में देखना छोड़ देता है .

वह जानता है कि जो भी जीवन वह आज जी रहा है या कल जीएगा ,वो उसके भूत के ,या वर्तमान के कृत्यों पर निर्भर करते हैं.इस प्रकार वह दुःख को प्राप्त नहीं होता और ये सोच कर सदैव प्रसन्न रहता है कि दुखों को भोगते हुए ,उसके अर्जित पाप कर्मों के फलों का ,क्षय हो रहा है.

साथ ही साथ प्रज्ञ व्यक्ति के जीवन में आने वाले अच्छे फल ,उसको और अच्छा करने के लिए ,प्रेरित करते हैं.इस प्रकार ,व्यक्ति का समभाव उसे ,जीवन का बेलगाव प्रेक्षक बना देता है .इस प्रकार आत्मा सत्त्चित और आनंद स्वरोप्प हुआ रहता है .