HOW TO LIVE LIFE: Put Money into charity

जीवन कैसे जीयें:धन संपत्ति को परोपकार में लगाओ:

आज कल व्यक्ति धन संपत्ति को ही सब कुछ मान बैठा है।ज्यादा से ज्यादा धन कमाने की लालसा में न केवल वह अपनों से दूर हो गया है वरन अनेकों अवगुणों का स्वामी हो गया है।वह ज्यादा धन और भौतिक वस्तुओं को ही सुख मान बैठा है।यह गलत विचार कि धन में सुख शांति है आज कल के व्यक्तियों पर हावी हो गया है।मकान,नाम,स्त्री,परिवार,विलास आदि भौतिक वस्तुओं के पीछे व्यक्ति निरंतर भाग रहा है।उसकी आवश्यकताएं कभी पूरी नहीं होती।वह अपनी सुविधा के लिए एक वस्तु संगृहीत करता है तो उसे चार और वस्तुओं की चाह होने लगती है।

सुख और शांति की खोज में भटकता हुआ मानव,भौतिकता के जाल में फंस कर,सुख के स्थान पर दुःख और अशांति के भयानक दावानल में निरंतर भस्म होता चला जाता है।वह उचित-अनुचित रूप से,जायज-नाजायज तरीकों से रूपये पैदा करता है,आलिशान मकानों में रहता है,जी भर के खर्च करता है पर उसको सुख और शांति नहीं मिलती।उसकी अवस्था मरुस्थल में भटकने वाले उस मृग के जैसी हो जाती है जो जल की तलाश में अपने प्राण खो देता है।

ऐसा इसलिए है कि वो जो अर्जित करता है,केवल अपने लिए,जो खर्च करता है,केवल अपने ऊपर।यदि वो ये मान ले कि उसे केवल उतना ही स्वयं पर लगाना है जितने की वास्तव में जरूरत है और बाकी वो अन्यों के उपकार के लिए लगाए तो उसे सच्ची ख़ुशी का अनुभव होगा।

मनुष्य को ये याद रखना चाहिए कि जो कुछ उसके पास धन-संपत्ति है,सुख-सुविधा के साधन हैं,सब भगवान् के दिए हुए हैं।प्राणीमात्र में ही भगवान् है,अत: उसके पास जो कुछ भी है,सब पर,सारे प्राणियों का स्वामित्व है।उसकी धन-संपत्ति,सुख-सुविधाओं पर प्राणीमात्र का अधिकार है।इसलिए मनुष्य को,अपनी धन-संपत्ति,अभाव में पड़े हुए, दुःख भोगते हुए और असुविधा में फंसे हुए प्राणियों की सेवा में लगानी चाहिए।ऐसा करने से मनुष्य न तो दूसरों का हिस्सा हड़प जाने वाला चोर,बेईमान कहलायेगा वरन भगवान् की चीज भगवान् की ही सेवा में लगा कर अपने लिए परम सौभाग्य को भी प्राप्त करेगा।

मनुष्य ये न सोच कर कि सभी धन-संपत्ति को केवल वो जैसे चाहे वैसे खर्च करेगा,उसको यथोचित लगाये,अर्थात् भगवत्भाव से प्रभु के बच्चों की सेवा में,सभी सुख-सुविधाओं को,प्रभु की ही मान कर लगा देगा तो उसका जीवन भाग्वद्पूजामय हो जाएगा।

धन-संपत्ति तथा सुख-सुविधाओं के द्वारा किसी प्राणी की सेवा कर के कुछ लोग अभिमान करने लग जाते हैं।पर तुम्हारा क्या था जो तुमने दिया?सब तो उस भगवान् का ही था।फिर अभिमान कैसा।आपने तो केवल उस गरीब का हक़ ही उस को दिया है।ये तो भगवान् की कृपा है कि मनुष्य के अन्दर सद्बुद्धि उत्पन्न हुई और उसे ये सुअवसर मिला।यदि मनुष्य किसी की सेवा कर के उस पर एहसान न करे,न बदला चाहे,न भगवान् से ही कोई फल चाहे,ऐसे मनुष्य पर भगवान् की कृपा बरस पड़ती है और वो परम कल्याण का भागी हो जाता है।

मरणोपरांत कोई भी वस्तु साथ नहीं जाती।आज वो आपके अधिकार में है,कल आपके मरने के बाद किसी और के अधिकार में चली जायेगी।पर यदि आपने उस धन को सद्कर्मों में लगा दिया है तो अर्जित सद्गुण ,प्रभुभक्ति और प्रेम अवश्य साथ जाएगा।यदि इन छूटने वाली,तुच्छ वस्तुओं के सदुपयोग से किसी को भगवद्कृपा की या भगवान् की प्राप्ति हो  जाती है तो आप तो बहुत बड़े लाभ में रहते हो।अंत में छूटने वाली वस्तुएं तो छूटने वाली ही हैं,आपके हाथ नहीं आने वाली।आपने इन्हें अपने हाथों प्राणीमात्र की सेवा में,भगवत्पूजा के भाव से अर्पित कर दिया।इससे बड़ी बात कोई नहीं हो सकती।असली धन संपत्ति तो परोपकार से उपजी प्रभु कृपा है,वो मोक्ष का द्वार है जिसके लिए ऋषि-मुनियों ने लाखों वर्ष तपस्या की थी।वो आपको केवल परोपकार से सहज ही प्राप्त हो जायेगी।