HOW TO LIVE LIFE:13

Think carefully and react by thinking: –

Most of the time, we are specialized in the art of superlative, means, talking extensively. Still it is true that we use only a small part of our abilities. There is a saying: “The biggest mistake which we Humans do – we listen half, understand fourths, do not think at all and gives double reaction. “Is this thinking, right? Does Such thinking not raise many questions?

It is a matter of grave concern that how do we destroy most of our life in utter ignorance. This can be an exaggeration (to describe it in a big way). But this is an indicator- about the hard truth of life. After all, how many of us, on some issue, before reacting fast, listens and thinks, about that issue properly?

While most of us know that on any issue, without any thought, any kind of quick response leads us to tragic end, yet we fail to rein in our anger and intolerance. And till when we realize this, it becomes too late to abandon it.

On this issue, the wise and scholars have given very beautiful quotes, but the quote from Greek thinker Epithets is very accurate here. They said: “What happens to you is not important, but how do you react to it is important.”

A Christian preacher Charles R. Swindoll has very well explained that “10% of life is, what happens to you and 90% is that how you react to it.”

We shall be free to assure ourselves that we will remove from ourselves the idea that we will do what is born to do.

Nothing can be less sensible than such a perception. We must think seriously and perform rational actions only then external forces will not be able to determine our destiny. Just like Woodrow Wilson had said, “A calm decision is better than thousands of suggestions given in haste. We must Spread the light, not the heat. “

HINDI TRANSLATION: हिंदी अनुवाद

जीवन कैसे जीयें:१३

विचारपूर्वक निर्णय लें और सोच विचार कर प्रतिक्रिया करें:

अधिकांश समय,हम अतिश्योक्ति की कला में माहिर होते हैं,अर्थात् बढ़-चढ़ कर बातें करते हैं।फिर भी यह सच है कि हम अपनी क्षमताओं का बहुत ही कम हिस्सा इस्तेमाल करते हैं।कहीं एक कहावत है:”सबसे बड़ी गलती जो हम मनुष्य करते हैं–हम आधा सुनते हैं,चौथाई समझते हैं,सोचते बिलकुल नहीं और प्रतिक्रिया दोगुनी देते हैं।” क्या ये सोच सही है?इस प्रकार कि सोच क्या कई प्रश्न खड़े नहीं करती?

ये गंभीर चिंता का विषय है कि कैसे हम सरासर अज्ञानता में अपने जीवन का अधिकाँश हिस्सा नष्ट कर देते हैं।ये एक अतिश्योक्ति(बढ़ा चढ़ा कर वर्णन करना) हो सकती है।पर ये एक संकेतक है-जीवन कि कठिन सच्चाई के बारे में।आखिरकार हममें से कितने,किसी मुद्दे पर,तीव्र गति से प्रतिक्रिया करने से पूर्व,उस मुद्दे के बारे में ठीक से सुनते हैं और सोचते हैं?

जबकि हममें से अधिकाँश ये जानते हैं कि किसी भी मुद्दे पर,बिना सोचे समझे किसी भी तरह की त्वरित प्रतिक्रिया,दुखद अंत की ओर ले जाती है,फिर भी हम अपनी गुस्से और असहिष्णुता की भावना पर लगाम लगाने में विफल रहते हैं।और जब हम इस बात का एहसास करते हैं तब तक इस को त्यागने के लिए बहुत देर हो चुकी होती है।

इस मुद्दे पर,बुद्धिमानों और विद्वानों ने बहुत सुन्दर उद्धरण दिए हैं,लेकिन ग्रीक विचारक एपिक्टेतुस का उद्धरण यहाँ बहुत सटीक बैठता है।उन्होंने कहा:”तुम्हारे साथ क्या होता है ये महत्वपूर्ण नहीं है,अपितु तुम इसके प्रति कैसी प्रतिक्रया करते हो ये महत्वपूर्ण है।”

एक ईसाई उपदेशक चार्ल्स आर० स्विन्दोल्ल ने बहुत अच्छी तरह से समझाया है कि“जीवन १०% वो है जो तुम्हारे साथ होता है और ९०% वो है कि तुम इसके प्रति कैसी प्रतिक्रया करते हो।”

हम अपने आप को विश्वास दिलाने के लिए स्वतंत्र हों कि हम ये धारणा कि हम वही करेंगे जो करने के लिए पैदा हुए हैं,को अपने से दूर करेंगे।

कुछ भी इस तरह की धारणा से कम समझदार नहीं हो सकता।हमें गंभीरता से सोचना होगा और युक्तिसंगत कर्म करना होगा तभी बाहरी ताकतें हमारे भाग्य को निर्धारित नहीं कर पाएंगी।जैसा कि वूड्रो विल्सन ने कहा था,”एक शांत निर्णय जल्दबाजी में दी गयी हजारों सलाहों से अच्छा होता है।प्रकाश फैलाओ,न कि गर्मी।”