HOW TO LIVE LIFE:BE HAPPY & SPREAD HAPPINESS:2

जीवन कैसे जीयें:खुश रहें और ख़ुशी फैलाएं :२

मानसिक संतुलन व आनंद प्राप्ति के लिए,व्यक्ति को ये जानना होगा कि असली शान्ति और ख़ुशी ,व्यक्ति के भीतर से ही झरती है.इस प्रकार उसे स्वयं के भीतर ही सच्ची ख़ुशी की तलाश करनी होगी.

जीवन,व्यक्ति के क्रिया-कलापों और विचारों का प्रतिबिम्ब होता है .कुछ लोग,ऐसे ही जीते और ऐसे ही मर जाते हैं.जबकि, आध्यात्मिक जीवन,व्यक्ति को आनंदपूर्वक रहने ,बिना किसी डर या तनाव के रहने,स्वयं की काबीलियत को सुधारने और आत्मविश्वास पैदा करने का मौका देता है .

व्यक्ति की सकारात्मक सोच ही ,व्यक्ति को सफलता की राह दिखाती है .

व्यक्ति भौतिकता के जाल में फंसा रहता है जबकि मानव जीवन,व्यक्ति को इसलिए मिलता है ताकि वो,अपनी आत्मा को,लुभावने भौतिक प्रलोभनों से ,छुटा सके और परमानन्द को प्राप्त कर सके.

ऐसा ,व्यक्ति ,परोपकार से भरे कार्य कर के ,सच बोल के,और उत्तम विचार रख के ,कर सकता है .

अपने विचारों,शब्दों और कार्य-कलापों ,में समानता रखने के लिए ,व्यक्ति को ,ध्यान एवम् जप का अभ्यास करना चाहिए .व्यक्ति पूर्ण रूप से ,तभी स्वतंत्र हो सकता है ,जब ,सभी इच्छाएं ,व्यक्ति के भीतर से ,समाप्त हो जाएँ.

व्यक्ति को चाहिए कि वो जो भी अच्छी बातें करता है,उन पर स्वयं अमल करे और साथ ही साथ ,अन्य लोगों की भावनाओं को भी सराहे और उनका सम्मान करे .मान-अपमान की भावना से वो विचलित न हो.क्षमा करने की भावना भी भीतर होनी चाहिए.घृणा,द्वेष की भावना को भी स्वयं से दूर रखना चाहिए.

अक्सर ,व्यक्ति को,जब,सुख सुविधा मिलती है,तो वो प्रसन्न हो जाता है .पर,जब उसके मन की नहीं होती,तो वो,उदास हो जाता है.वो ,भौतिक सुख देने वाली वस्तुओं से चिपका रहता है और अक्सर अपनी लालसाओं और वासनाओं का विरोध नहीं कर पाता.

पर,जो व्यक्ति ,ध्यान एवम् तप के द्वारा ,इन इच्छाओं से,मुक्ति पा लेता है ,वो,शांत और प्रकृतिस्थ होता है.इच्छाओं से मुक्ति,अर्थात् भौतिक इच्छाओं से अनासक्ति,के द्वारा ही ,व्यक्ति ,मानसिक संतुलन प्राप्त कर सकता है और प्रसन्न रह सकता है.

जब,व्यक्ति ,सभी इच्छाओं से अनासक्त होता है ,तो वह आत्मज्ञान प्राप्त कर सकता है.जब ,व्यक्ति आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है ,तो वह जानता है कि वह ,केवल एक आत्मा है ,शरीर नहीं .इस प्रकार वह, अहंकार की भावना से बाख सकता है ,जो ,खुद को शरीर समझने से आती है.

अक्सर,व्यक्ति,अपनी असली वास्तविकता से अनभिक्ष रहता है कि वह आत्मा है और अपने पूर्व कर्मों को भुगत रहा है .जब वह ,आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है तो जानता है कि वह केवल ,परमात्मा का ही अंश है और इस प्रकार वह ,आत्मा-स्वरुप ,परमात्मा के ,सभी गुणों से परिपूर्ण है.

इस प्रकार, जब व्यक्ति ,ये सब जानता हुआ,भीतर की ओर मुड़ता है,तो उसे,असीम शांति की प्राप्ति होती है .इस प्रकार ,तप और ध्यान के द्वारा ,भीतर झांकता व्यक्ति,खुद के भीतर बहते हुए,परमानंद रुपी झरने के ,दर्शन कर सकता है.और जान पाता है कि असली स्वर्ग ,उसके भीतर ही है .

कहने का अर्थ है कि व्यक्ति को चाहिए कि वह ,अपने चारों ओर ख़ुशी की तलाश में न भटक कर ,स्वयं के भीतर ,ख़ुशी खोजे.जब व्यक्ति,बाहर की ओर झांकता है और ख़ुशी खोजता है ,तो वो अक्सर ,भौतिक सुख को ही ख़ुशी समझ बैठता है .पर ये ख़ुशी क्षणिक होती है.

जबकि ,वास्तविक ख़ुशी तो भीतर है.जब व्यक्ति ,अपनी आत्मा को खोजता है और जीवन के उद्देश्य को समझ लेता है और आत्मज्ञानी हो जाता है तो वह,भीतर से आनंदमय हो जाता है .

इस प्रकार,व्यक्ति,स्वयं के चारों ओर भी,प्यार,करुणा,दया और मदद के द्वारा ,आनंदपूर्ण माहौल की ,स्थापना करता है.इस प्रकार,व्यक्ति के जीवन में ,संतुष्टि,आनंद और शान्ति का आविर्भाव होता है.

एक प्रसन्न,आनंदमयी आत्मा के साथ रहना ,वास्तव में,आनंददायक है.ऐसी आत्मा,सकारात्मकता का संचार करती है और हर तरफ अच्छाई फैलाती है.

असली आनंद तब है ,जब हम ,सौहार्दता के साथ ,इकट्ठे रह कर,एक दूसरे के काम आ सकें.