HOW TO LIVE LIFE :17
Lookup within yourself: 2
A person’s life can be understood by the example of the farmer. The farmer sows’ seeds and receives its benefits in the form of fruit. The clay is like this physical world and it is like seeds, thoughts, words and actions and Whatever a person receives in life is the reward for all these.
Each action gives rise to an energy that comes back to the people in one form or the other form. The nature of the person’s soul is as clear as the mirror. The person should listen to the inner voice of his own soul so that he can do right work. The person’s life is made by God and everything is predetermined.
Although the sins committed by the previous birth are not remembered by people, but they have the power to improve their deeds of this life. When a person is conscious inwardly, then he comes in a positive frame, which connect him with the God and his soul becomes pure.
But to do this, he should not be obsessed with external beauty and must lookup within himself. The person always looks for someone’s fellowship and in doing so forget that he can be his best friend.
When a person spends time with himself, then it helps him to understand himself. He starts knowing his strength, weakness, desires, disorders and his goal. By knowing this, a person can refine his own personality. Any person, when becomes a critic, judge and consultant about himself, can improve his personality better.
The person’s thoughts can be his best friend. When a person spends time with himself, he not only strengthens his will, but he becomes more focused on achieving the goal. Thus, a person, can move towards becoming better and successful. ……….. cont.
HINDI TRANSLATION: हिंदी अनुवाद
जीवन कैसे जीयें:१७
स्वयं के भीतर झांकें:२
किसी व्यक्ति के जीवन को किसान के उदाहरण द्वारा बखूबी समझा जा सकता है।किसान बीज बोता है और फल के रूप में उसका लाभ प्राप्त करता है।मिटटी इस भौतिक संसार की भांति है और ये बीज,विचारों,शब्दों और कार्यों की भांति हैं और जो कुछ भी व्यक्ति,जीवन में प्राप्त करता है वह इन सब का प्रतिफल है।
प्रत्येक क्रिया एक ऊर्जाबल को जन्म देती है जो किसी न किसी रूप में व्यक्ति के पास वापस आ जाती है।व्यक्ति की आत्मा की प्रकृति बिलकुल शीशे की तरह साफ़ है।व्यक्ति को चाहिए कि वो स्वयं की आत्मा की भीतरी आवाज को सुने ताकि वह सही कर्म कर सके।व्यक्ति का जीवन भगवान् का बनाया है और सब कुछ पूर्व निर्धारित होता है।
हालांकि पूर्व जन्म के किये हुए पाप-पुन्य व्यक्ति को ध्यान नहीं होते,लेकिन उसके पास सामर्थ्य है कि वो इस जन्म के अपने कर्मों को सुधार सके।जब व्यक्ति भीतर की ओर चेतनामय होता है तो एक सकारात्मक ढाँचे में आ जाता है जो उसे भगवान् से जोड़ता है और उसकी आत्मा शुद्ध हो जाती है।
पर ऐसा करने के लिए उसे बाह्य सौन्दर्य के प्रति आसक्त न हो कर भीतर की ओर झांकना होगा।व्यक्ति प्रतिक्षण किसी अन्य का साथ खोजता रहता है और ऐसा करने की चाह में भूल जाता है कि वो स्वयं का सबसे अच्छा मित्र हो सकता है।
जब व्यक्ति स्वयं के साथ वक्त बिताता है तो उसे स्वयं को समझने में मदद मिलती है।उसे अपनी ताकत,कमज़ोरी,इच्छाएँ,विकारों और अपने लक्ष्य का पता चलता है।ऐसा जान कर व्यक्ति स्वयं के व्यक्तित्व को निखार सकता है।कोई भी व्यक्ति जब स्वयं का आलोचक,न्यायाधीश और परामर्शदाता बनता है तभी वो अपने व्यक्तित्व को बेहतर सुधार सकता है।
व्यक्ति के विचार ही उसके सबसे अच्छे मित्र हो सकते हैं।जब व्यक्ति स्वयं के साथ वक्त बिताता है तो न केवल उसकी इच्छा शक्ति दृढ हो जाती है बल्कि लक्ष्य प्राप्ति पर उसका ध्यान और भी केन्द्रित हो जाता है।इस प्रकार व्यक्ति एक बेहतर और सफल व्यक्ति बनने की दिशा में अग्रसर हो सकता है।……….क्रमश: