HOW TO LIVE LIFE: BE COMPASSIONATE

When Prince Siddhartha saw abundance of sufferings and hardship around him, he renounced the world and went out in search of truth. He wanted to know the reason for the suffering and misery of this world. He attained Nirvana and he became Buddha. He shared his insights with those who wanted to hear them.

Even in today’s time, there are many people who, in different forms, are helping people who are suffering from pain and misery with an intention that they will be able to make some changes in the lives of those people.

Pain and sorrow increase our sensitivity and makes us more sensitive to those people who are afflicted just like us with every kind of injustice; this is a way by which we become more compassionate.

True compassion and kindness mean not only to understand the pain of others, but also to try to remove them from that pain. Human kindness connects us all in one form. In such a society, where there are principles of love and compassion to guide us, there is no pain and suffering.

Doing nothing for others means to destroy the soul itself. We should be purposefully compassionate and generous, which is the best part of our existence. Our heart presents itself for this work and becomes joyful. This is a great secret of our spiritual life.

By helping others, we can, in fact, help ourselves greatly. Similarly, as long as we do not do anything for others, then we cannot expect any help from others. By helping each other and keeping a sense of compassion on the whole world, not only can we reduce the pain of one another but also get the state of ecstasy.

HINDI TRANSLATION: हिंदी अनुवाद

जीवन कैसे जीयें:करुणामय बनें :

राजकुमार सिद्धार्थ ने जब अपने चारों ओर दुःख और पीड़ा की बहुतायत देखी तो संसार का त्याग किया और सच की खोज में निकल पडे।वे इस संसार के दुःख और पीड़ा का कारण जानना चाहते थे।उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ और वे बुद्ध हो गए।उन्होंने अपनी अंतर्दृष्टि को उन लोगों के साथ बांटा जो उन्हें सुनना चाहते थे।

आज कल के समय में भी,अनेकों लोग हैं,जो दुःख और पीड़ा से ग्रस्त लोगों की अलग-अलग रूप में,इस इच्छा से कि वे उन लोगों के जीवन में कुछ बदलाव कर सकेंगे,मदद करते हैं।

पीड़ा और दुःख,हमारी संवेदनशीलता को बढाते हैं और हमें उन लोगों के प्रति,जो हर प्रकार के अन्याय से हमारी तरह ही संतप्त हैं,और अधिक संवेदनशील बनाते हैं।ये एक तरीका है जिसके द्वारा हम अधिक करुणामय बन जाते हैं।

सच्ची करुणा और दया का अर्थ है,न केवल दूसरों के दुःख-दर्द को समझना,अपितु उन को उस दुःख-दर्द से निकालने के लिए प्रयत्न भी करना।मानवीय दया हम सब को एक सूत्र में जोडती है।एक ऐसे समाज में,जहाँ प्यार और करुणा मार्गदर्शक सिद्धांत होते हैं,वहाँ,पीड़ा और दुःख-दर्द समाप्त हो ही जाते हैं।

अन्यों के लिए कुछ न करने का अर्थ स्वयं अर्थात आत्मा का नाश करना है।हमें उद्देश्यपूर्ण रूप से दयालु और उदार होना चाहिए जो कि हमारे अस्तित्व का सर्वोत्तम हिस्सा होता है।हमारा दिल इस काम के लिए स्वयं को प्रस्तुत करता है और आनंदमय हो जाता है।ये हमारे आत्मिक जीवन का महान रहस्य है।

हम दूसरों की मदद कर के,वास्तव में,स्वयं की सबसे बेहतरीन मदद कर सकते हैं।ऐसे ही,जब तक हम,अन्यों के लिए,कुछ नहीं करेंगे तो किसी अन्य से भी सहायता की उम्मीद नहीं कर सकते।आपस में एक दूसरे की मदद कर के और प्राणीमात्र पर करुणा की भावना रख कर ही न केवल हम एक दूसरे के दुःख-दर्द को कम कर सकते हैं बल्कि एक परमानंद की अवस्था को भी पा सकते हैं।