How to live life: Remain Humanist: 2

In this difficult period, in the race to move forward, human has become the enemy of human. Religious frenzy and caste fights are at its peak. We must stop ourselves, and should, by thinking and identifying the basic relationship of human beings, thus help to prevail humanity. We should not identify people on the outer base, such as on the bases of race, religion and creed.

We have to present ourselves in the form of such person who, when, sees others in distress, becomes compassionate and presents himself for the help of the needy.

We should recognize humanity present within ourselves, and in this difficult time, we have to prepare ourselves for the help of each other, only then humanity will prevail.

The lessons of ethics are taught to us only because our basic nature, humanity has been suppressed in various ways. Thus, by reading the text of ethics, we can stay organized because if ethics is not there, then man will become like beast  and  will spread only Anarchy because humanity will not be awaken within human beings.

However, if a man lives with humanity, then his heart will be cleansed by himself. Then, to organize his life, the virtue of ethics will not be needed.

When we are filled with humanity, then we feel that every person in front of us is like us.  Moreover, when we will look at everyone like ourselves, then how can any unethical act we will be able to do?

When we see all the people like ourselves, then feelings of casteism, nationalism, communalism, etc. will not come, as we will be able to see ourselves in the person in front of us.

Thus, when the heart of every person will be full of humanity, then not only will the entire world be eliminated by all evils, but the world will be able to live just like heaven.

HINDI TRANSLTION:

जीवन कैसे जीयें:मानवतावादी रहें :

आजकल के इस कठिन दौर में,जब आगे बढने की होड़ में,मानव,मानव का दुश्मन बना हुआ है,धार्मिक उन्माद और जातिगत झगडे ,अपने चरम पर हैं,हमें चाहिए कि हम रुक कर सोचें और मनुष्य से मनुष्य के आधारभूत रिश्ते को पहचान कर मानवता को प्रबल होने दें न की ऊपरी आधार पर,जैसे की जाति ,धर्म और पंथ के आधार पर,लोगों को न आंकें।

हमें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में खुद को प्रस्तुत करना होगा,जो दूसरों को कष्ट में देख कर ,द्रवित हो जाए और जरूरतमंदों की मदद को प्रस्तुत हो जाए।

हमें स्वयं के भीतर मौजूद ,मानवता को पहचानना होगा और इस कठिन समय में ,एक दूसरे की मदद के लिए खुद को तैयार करना होगा,तभी मानवता प्रबल होगी।

हमें नैतिकता का पाठ,इसलिए ही पढाया जाता है क्योंकि हमारी मूलभूत प्रकृति,मानवता को विभिन्न तरीकों से दबा दिया गया है।इस प्रकार,नैतिकता का पाठ पढ़ कर,हम व्यवस्थित रह सकेंगे क्योंकि यदि नैतिकता ही नहीं होगी तो मनुष्य पशुवत हो जाएगा और अराजकता ही फैलाएगा क्योंकि मानव के भीतर मानवता तो जागृत होगी ही नहीं।

पर,यदि मनुष्य,मानवता के साथ रहेगा,तो उसका हृदय तो अपने आप से ही निर्मल हो जाएगा।तब उसके जीवन को व्यवस्थित करने के लिए,नैतिकता के गुण की आवश्यकता नहीं रहेगी।

जब हम मानवता से भरे होंगे,तो हमें सामने वाला प्रत्येक व्यक्ति स्वयं सा प्रतीत होगा।और जब हम सभी को,स्वयं की भांति देखेंगे तो कोई भी अनैतिक कार्य कैसे कर पायेंगे।

जब हम सभी को अपनी ही भांति देखेंगे तो जातिवाद,राष्ट्रीयवाद,साम्प्रदायिकता आदि भावनाएं आएँगी ही नहीं क्योंकि हम सामने वाले व्यक्ति में भी खुद को ही देखेंगे।

इस प्रकार जब प्रत्येक व्यक्ति का दिल मानवता से भरा होगा तो न केवल इस संसार से समस्त बुराइयोंका खात्मा हो सकेगा अपितु संसार स्वर्ग के समान रहने योग्य हो जाएगा।