HOW TO LIVE LIFE:BE COMPASSIONATE:2

Inequalities spread in society, reflect the decline of any society. In any society, peace can come only when injustice will be eliminated from the society. Unless we will not leave the habit of collecting more than we need, namely will not live in harmony, by all means, the welfare of society is impossible. In reality, the same life is meaningful, which has been lived for others.

We must keep in mind and understand that we, only by taking birth as a human being, can find and get the path of progressing in our soul. And this path of the advancement of the soul can be found only by the grace of the Lord, which we call by names like Dayanidhi, Garibnavaj etc.

A great life can be attained by the Lord’s blessings and grace and this blessings and grace can only be attained by living benignant and compassionate life towards all living beings. This cannot be attained by any other way. Because when we have compassion on all living beings, we automatically become recipient of grace of the God.

When compassion and benignancy are shown to the creatures, knowledge and love also flourish together and there comes Lord-loving grace in life. But when compassion and benignancy, for the creatures disappears then knowledge and love also diminishes and God’s grace ends. The evil forces engulf our lives.

Virtue is nothing else but to show love, compassion and benignancy towards the creatures, and on the other hand, malfeasance means to be without compassion for the creature.

Living a compassionate life towards a creature means, by communicating compassion towards one another, which comes when we see and feels the hunger, thirst, disease, poverty, fear and death etc. of someone else and help them and remain absorbed in the Lord’s devotion.

All the creatures are created by God and all are brothers of one another. When a brother sees another brother in pain, is filled with compassion. On the other hand, some people, even seeing the distress of others, do not have feelings of compassion, they are really hard hearts. Such souls are not awakened and they remain deprived of the grace of God.

Enlightenment, which comes from living a compassionate life, is indeed the light of the Lord. The bliss which comes from living such a life, is divine. Such a person, who has realized this enlightenment and divine ecstasy, have become exculpated while alive, and are worthy of the knowledge of Lord.

 

जीवन कैसे जीयें:करुणामय बनें :२

स्पष्ट असमानताएं,अर्थात् समाज में फैली हुई असमानताएं,किसी भी समाज की गिरावट को दर्शाती हैं।किसी भी समाज में शान्ति तभी आ सकती है जब समाज से अन्याय का खात्मा हो जाएगा।जब तक हम जरूरत से ज्यादा इकठ्ठा करने की आदत नहीं छोड़ेंगे अर्थात् मिल-बाँट कर नहीं खायेंगे,तब तक समाज का कल्याण असंभव है।वास्तव में वही जीवन अर्थपूर्ण है,जो औरों के लिए जीया गया हो।

हमें ध्यान रखना होगा और समझना होगा कि हम,केवल इस मनुष्य जन्म में ही अपनी आत्मा की उन्नति का मार्ग तलाश और प्राप्त कर सकते हैं।और आत्मा की उन्नति का ये मार्ग हमें प्रभु की,नैसर्गिक कृपा से ही मिलता है,उस प्रभु की,जिसे हम दयानिधि,गरीबनवाज आदि नामों से पुकारते हैं।

एक महान जीवन प्रभुकृपा से ही प्राप्त किया जा सकता है और वो कृपा प्राप्त होती है प्राणीमात्र के प्रति करुणा और दयापूर्ण जीवन जीने से।ये हमें किसी अन्य मार्ग से प्राप्त नहीं हो सकती क्योंकि जब हम प्राणीमात्र पर करुणा रखते हैं तो उस करुणामय के कृपा पात्र अपने आप बन जाते हैं।

जब प्राणीमात्र के प्रति करुणा और दया प्रकट होती है,ज्ञान और प्रेम भी साथ-साथ फलने-फूलने लगते हैं और जीवन में प्रभु-कृपा का आगमन होता है।पर जब प्राणीमात्र के प्रति करुणा और दया गायब हो जाती है तो ज्ञान और प्रेम का भी ह्रास हो जाता है और प्रभु कृपा भी समाप्त हो जाती है और जीवन में शैतानी ताकतें घर कर लेती हैं।

सदाचार कुछ नहीं है बल्कि प्राणीमात्र के प्रति प्रेम,दया और करुणा दिखाना है और वहीं,दुराचार का अर्थ है प्राणीमात्र के प्रति करुणा से विहीन होना।

प्राणीमात्र के प्रति करुणामय जीवन जीने का अर्थ है,लोगों में एक दूसरे के प्रति करुणा का संचार करते हुए,जो तब आती है जब कोई अन्य की भूख ,प्यास,बीमारी ,गरीबी भय और मौत आदि दुःख-तकलीफों को देखता और महसूस करता है ,प्रभु भक्ति में लीन रहना।

सभी प्राणी भगवान् के बनाए हुए हैं और सभी एक दूसरे के बंधू हैं।जब एक भाई दूसरे भाई को दुःख-तकलीफ में देखता है तो उसके प्रति करुणा दया से भर जाता है।वहीं कुछ व्यक्ति,दूसरे की दुःख तकलीफ देख कर भी,उनके प्रति करुणा का भाव नहीं रखते,वास्तव में कठोर हृदय हैं।ऐसे लोगों की आत्मा जागृत नहीं होती और वो प्रभु कृपा से वंचित रह जाते हैं।

प्रबुद्धता,जो करुणामय जीवन जीने से आती है,वो वास्तव में प्रभु का प्रकाश है और जो परमानंद,ऐसा जीवन जीने से आता है,वो दिव्य है।ऐसे व्यक्ति,जिन्होंने इस प्रबुद्धता को और दिव्य परमानंद को महसूस कर लिया है,वे जीवित ही मुक्त हो गए हैं और प्रभु-ज्ञान और प्रभु-कृपा के पात्र हैं।