How to live life:Remain Humanist:1

Most of the people, agree that humanity is a precious fund of society, and often it is widely discussed in social occasions. However, despite all this, we see that humanity is unique due to its absence in our social structure.

Our relations are determined not on humanitarian basis but on caste, color, nationality, religion, sect. Religious fanaticism, communalism, regionalism, casteism etc. have become a major basis for our social relationships. Moreover, the result, on a large scale is hate, evil, violence and worst is terrorism have emerged, which has become a global problem.

What is humanity? It means to be human or to be human, to work in the happiness and misery of others. Being human is to be compassionate, be sensitive, and be kind and generous.

Although every person likes these values, but when it comes to everyday life, unique is someone who brings these values into his life. We find that we are completely unaware with each other’s grief and pain and always nurture a sense of hatred and selfishness. Whereas In order to look the world as a single family, love and empathy is very much needed.

The main reason for this ignorance is to forget about the relationship between yourself and the God. When we understand that all of us are only an extended form of this divine power, then we understand that even if we think of God in any form and call it by any name, in fact, it is only one. That means, we see the God by various forms and names, in any religion, community, caste etc., but indeed he is one. I.e. that we are able to understand that we are children of the same God and made up of the same substance and the same consciousness.

In this way, we can establish our relation with others and we can follow the path of humanity.

We must also remember that only the service of humanity is in reality the true God’s service, because every human is not merely a structure made of bone-meat but there is a presence of such a divine soul (God) inside each, , Which starts with a search and finds complete results in salvation.

If a person has chosen to be unaware of his social responsibilities, by eliminating his social consciousness, he can certainly make no progress in his spiritual journey.

With praising God, we must fulfill our daily obligatory work, such as the maintenance of the house and other household works. Only in this human life, we can fully understood God, who is the ultimate truth of human existence.

Even while living in a family life, the simplest way to worship God is to be live with love with your fellow human beings.

When we will lead a life full of humanity and help every human being, then it will be the greatest service of humanity and divine God.

 HINDI TRANSLATION:-

जीवन कैसे जीयें:मानवतावादी रहें :१

अधिकाँश,इस बात से सहमत होंगे कि इंसानियत समाज की एक बहुमूल्य निधि है और अक्सर सामाजिक अवसरों आदि में इसकी व्यापक चर्चा भी होती है।पर इन सब के बावजूद हम देखते हैं कि मानवीयता,हमारे सामाजिक ढाँचे में गैरमौजूद होने की वजह से विशिष्ठ है।

हमारे रिश्ते मानवीय आधार पर न हो कर,जाति,रंग,राष्ट्रीयता,धर्म,सम्प्रदाय पर निर्धारित होते हैं।धार्मिक कट्टरता,साम्प्रदायिकता क्षेत्रीयवाद,जातिवाद आदि हमारे सामाजिक रिश्तों का,एक प्रमुख आधार हो गए हैं।और इसका परिणाम,बड़े पैमाने पर घृणा,बुराई,हिंसा और सबसे बदतर –आतंकवाद के रूप में सामने आया है जो कि एक वैश्विक समस्या बन गया है।

मानवता क्या है?इसका अर्थ है मानव बनना या मानवीय होना अर्थात् दूसरों के सुख-दुःख में काम आना।मानवीय होने का अर्थ है दयालु होना,संवेदनशील होना,रहमदिल और उदार होना।

हालांकि हर व्यक्ति इन मूल्यों को पसंद करता है पर जब रोजमर्रा की जिंदगी की बात आती है तो बिरला ही कोई,इन मूल्यों को अपने जीवन में उतारता है।हम पाते हैं,हम एक दूसरे के दुःख-दर्द से पूरी तरह विमुख होते हैं और एक घृणा और स्वार्थ की भावना पाले रखते हैं।जबकि संसार को,एक ही परिवार के रूप में देखने के लिए,प्यार और सहानुभूति की परम आवश्यकता है।

इस अज्ञानता का प्रमुख कारण है,अपने और उस परम पिता के बीच के रिश्ते को विस्मृत कर देना।जब हम ये समझ पाते हैं कि हम सभी उस एक दिव्य शक्ति,परमपिता परमेश्वर का ही विस्तारित रूप हैं तो हम समझ पाते हैं कि चाहे परमपिता परमेश्वर को हम किसी भी रूप में सोचें,किसी भी नाम से पुकारें,वास्तव में वो एक ही है अर्थात् किसी भी धर्म,सम्प्रदाय,जाति आदि में,हम भगवान् को विभिन्न रूपों और नामों से देखते हैं,पर वास्तव में वो एक ही है।अर्थात् हम समझ पाते हैं कि हम एक ही ईश्वर की संतानें हैं और सभी समान पदार्थ और चेतना से ही मिल कर बने हैं।

इस प्रकार हम स्वयं का औरों से सम्बन्ध स्थापित कर पाते हैं और मानवता का दामन थामे आगे चल सकते हैं।

हमें ये भी याद रखना होगा कि मानवता की सेवा ही सच्ची ईश्वर सेवा है क्योंकि प्रत्येक मानव केवल हाड-माँस का बना हुआ कोई ढांचा मात्र नहीं है बल्कि प्रत्येक के भीतर एक ऐसी दिव्य आत्मा(परमात्मा)की उपस्थिति होती है जो उसे एक ऐसी यात्रा पर चलने के लिए प्रेरित करती है जो एक खोज से शुरू हो कर,मुक्ति में पूर्ण परिणति पाती है।

अगर किसी व्यक्ति ने,अपनी सामाजिक चेतना को ख़त्म कर के,अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों से बेखबर होना ही चुना है तो वह निश्चित रूप से,अपनी आध्यात्मिक यात्रा में कोई प्रगति नहीं कर सकता है।

हमें ईश्वर की स्तुति करते हुए,अपने दैनिक कार्य,जैसे घर और चूल्हा-चौकी की देखभाल जैसे अनिवार्य कार्यों को पूरा करना चाहिए।केवल इस मानव जीवन में ही,उस परमात्मा को,जो मानव अस्तित्व का परम सत्य है,पूरी तरह से समझा जा सकता है।

और पारिवारिक जीवन में रहते हुए भी,परमात्मा की भक्ति का सबसे सरल उपाय है-अपने साथी मानवों के साथ,प्रेमपूर्वक रहना।

जब हम मानवता से भरा हुआ जीवन व्यतीत करेंगे और प्रत्येक मनुष्य की मदद करेंगे,तो वही मानवता की और परमात्मा की,सबसे बड़ी सेवा होगी।