PONDERABLE-APPRECIATION:

Appreciation is such weapon, with which enemy can also be made friend – Dayanand Saraswati

VIZ When we commend someone, then that person gets happiness and he starts thinking good for us. If we also admire our enemy, he will leave his enmity, starts thinking well about us, and become our friend. Make this way appreciation is such weapon, with which enemy can also friend.

Whatever is best in humans, it can be developed by praise and encouragement- Charles Schwab

VIZ When a person works good, charity, and people praised him for it, then he becomes even more altruistic with double passion. The encouragement that comes through the praise, gives more strength to the good qualities hidden within him. Thus, he becomes more virtuous, hardworking and altruistic.

If you want that others should praise you, then you should first learn to praise others-Emerson

VIZ Every person wants his appreciation. If we praise others, we will not only encourage them to give them the best, but also established love and affection for us in their minds. Thus, when we will do any work, we will also achieve their Praise and encouragement.

Do not waste your time in praise of someone’s qualities; try to adopt his qualities – Karl Marx

VIZ It is not enough to appreciate only one’s qualities. When we consider someone to be worthy of praise for some of his qualities, then it means that we like that quality. But only liking that quality is not enough. We should adopt that quality ourselves. That is why we too can become eligible for praise because of that quality.

The appreciation made by the opponent is the best fame – Tomas Moor

VIZ When a person is so virtuous and so hard working that even his opponents starts praising him, then it is the best prestige and fame one can have. Those who are not our opponents, they praise us, but our opponents due to our rivalry, may hardly praise us. However, when the person becomes so talented that the opponent also begins to praise him .That is the best fame to get.

HINDI TRANSLATION-हिंदी अनुवाद

विचारणीय: प्रशंसा:

प्रशंसा वह हथियार है ,जिससे शत्रु भी मित्र बनाया जा सकता है –दयानन्द सरस्वती

अर्थात् जब हम किसी की प्रशंसा करते हैं तो उस व्यक्ति को ख़ुशी मिलती है और वो हमारे बारे में अच्छा सोचने लगता है।यदि हम अपने शत्रु की भी प्रशंसा करेंगे तो वो अपनी शत्रुता छोड़ कर हमारे बारे में अच्छा सोचने पर मजबूर हो जाएगा और हमारा मित्र बन जाएगा।इस प्रकार प्रशंसा वह हथियार है,जिससे शत्रु भी मित्र बनाया जा सकता है।

मानव के अन्दर जो कुछ सर्वोत्तम है ,उसका विकास प्रशंसा तथा प्रोत्साहन के द्वारा किया जा सकता है- चार्ल्स श्वाब

अर्थात् जब कोई व्यक्ति अच्छे और परोपकार से भरे काम करता है और उसे अन्य व्यक्तियों से इसके लिए प्रशंसा मिलती है तो वह दुगने जोश से और भी अधिक परोपकारी हो जाता है।प्रशंसा के द्वारा उसे जो प्रोत्साहन मिलता है,वह,उसके भीतर छुपे हुए अच्छे गुणों को और अधिक उभार देता है।इस प्रकार वह और अधिक गुणी,परिश्रमी और परोपकारी हो जाता है।

यदि तुम चाहते हो कि दूसरे तुम्हारी प्रशंसा करें,तो पहले तुम दूसरों की प्रशंसा करना सीखो-एमर्सन

अर्थात् प्रत्येक व्यक्ति अपनी प्रशंसा चाहता है।यदि हम दूसरों की प्रशंसा करेंगे तो न केवल उन्हें उनका सर्वोत्तम देने के लिए प्रोत्साहित करेंगे बल्कि उसके मन में अपने लिए प्रेम और स्नेह की भी स्थापना करेंगे।इस प्रकार जब हम कोई कार्य करेंगे तो हमें भी उनके द्वारा प्रशंसा और प्रोत्साहन की प्राप्ति होगी।

किसी के गुणों की प्रशंसा में अपना वक्त फजूल में न गँवाओ,उसके गुणों को अपनाने का प्रयास करो-कार्ल मार्क्स

अर्थात् केवल किसी के गुणों के लिए उसे प्रशंसित करना ही काफी नहीं है।जब हम किसी को उसके किसी गुण के लिए प्रशंसा का पात्र मानते हैं तो इसका अर्थ ये है कि हम उसके उस गुण को पसंद करते हैं।पर केवल उस गुण को पसंद करना ही काफी नहीं है।उस गुण को हमें स्वयं अपनाना चाहिए।ताकि हम भी उस गुण के कारण प्रशंसा के पात्र बन सकें।

प्रतिद्वंदी द्वारा की गयी प्रशंसा सर्वोत्तम कीर्ति है-टामस मूर

अर्थात् जब कोई व्यक्ति इतना गुणी हो,इतना मेहनती हो कि उसके प्रतिद्वंदी भी उस की प्रशंसा करने लगें तो इससे अधिक प्रतिष्ठा और कीर्ति की बात कोई और नहीं हो सकती।जो लोग हमारे प्रतिद्वंदी नहीं हैं वो तो हमारी प्रशंसा करते ही हैं ,पर हमारा प्रतिद्वंदी अपनी प्रतिद्वंदिता के कारण शायद ही हमारी प्रशंसा करे।किन्तु जब व्यक्ति इतना ज्यादा प्रतिभाशाली हो जाए कि प्रतिद्वंदी भी उसकी प्रशंसा करने लगे तो वही सर्वोत्तम कीर्ति है।