PONDERABLE:43

Rather than being angry, cherish the feeling of care and respect for those, who create difficulties because, by creating such difficult conditions, they provide us with an invaluable opportunity to practice tolerance and patience. – xiv Dalai Lama

VIZ Those who create difficulties for us, in reality, their purpose is to mislead us from our path so that we cannot attain our goal. If we will get angry on doing so by them, then instead of focusing on our goal. , we will try to harm those people. But if we look at the second aspect of it, we will find that when such a person creates difficult situations for us, then they also provide us an opportunity to deal and endure the same with a perseverance. That is why we should not get angry with them and should respect them, because only because of them, we can be more tolerant.

The meaning of Work without any attachment is to work without expecting any reward or without fear of any punishment in this world or the next world. Such a task is the medium of reaching the goal and God is that goal. – Ramakrishna Paramhansa

VIZ The person should do the job without wishing for anything. When we do any work without fear of any reward or fear of punishment, then there is no pressure on us and we can easily do the duty of charity. The person who does not have any fear or greed, can do such a thing that is for the good of others and only such acts are dear to God and the ultimate goal of human life, which is to get the God, is only possible by such actions.

There is no insult on being criminal once. But it would be insulting to remain criminal. -Malcom X.

VIZ The person unknowingly can do such works which are criminal. But if this crime is first time, then the person can atone for the sins, and then he can be free from that sin. But if the person repeatedly acts as a criminal then it means that They do not want to improve. What can be a big disgrace then this that the person continues to be criminals and take the position of being the culprit.

Nothing is great to be superior to your companions. True greatness lies in being superior to your former self. -Ernest Hemingway

VIZ Any person can be superior to his associates. That is why there is no greatness in it. But if you continually improve yourself and make your soul elevate then one day you become best and become the recipient of salvation. The meaning of saying is that the greatness is to elevate your self, that is, because the person who did not purify his soul and did not take it to the God’s door then how can he be great.

The light of sun fell on the wall, the lending of the wall was glorified. Why is it that you put your heart on a piece of earth, o simple man? Find a source that shines forever. -Jalaluddin Rumi

VIZ The person should not be covetous of material things because material things are not going to remain forever. The glow of wealth is only for some time because it cannot be with us forever. One day, wealth and money leaves us. When we have wealth, for some time we are called Seth. But when wealth goes away, we become poor again. We should only search for the living source i.e. God. God is eternal and everything is faded in front of his brightness. Whoever, found God, his personality became always been shining forever. That is why should worship devotion to God only and not of the wealth.

HINDI TRANSLATION: हिंदी अनुवाद

विचारणीय:४३

नाराज होने के बजाय,मुश्किलें पैदा करने वालों के प्रति गहरी देखरेख और सम्मान कि भावना पोषित करें क्योंकि ऐसी कठिन परिस्थितियाँ पैदा कर के वे हमारे लिए सहिष्णुता और धेर्य का अभ्यास करने के अमूल्य अवसर प्रदान करते हैं।-xiv दलाई लामा

अर्थात् जो लोग हमारे लिए मुश्किलें पैदा करते हैं वास्तव में उनका उद्देश्य हमें हमारे रास्ते से भटकाना होता है ताकि हम अपने लक्ष्य को प्राप्त न कर सकें।यदि उन के ऐसा करने से हम उन से नाराज हो जायेंगे तो बजाय अपने लक्ष्य पर ध्यान केन्द्रित रखने के,उन लोगों को नुक्सान पहुँचाने की कोशिश में लग जायेंगे।पर यदि हम इसका दूसरा पहलु देखेंगे तो पायेंगे कि जब ऐसे व्यक्ति हमारे लिए कठिन परिस्थितियों का सृजन करते हैं तब वे हमें धेर्य के साथ उनको सहने और उनसे निबटने का एक अवसर भी प्रदान करते हैं।इसलिए हमें उन से नाराज होने कि बजाय उनका सम्मान करना चाहिए क्योंकि केवल उन्ही के कारण हम ज्यादा सहिष्णु और धेर्यवान हो सके।

बिना किसी आसक्ति के काम करने का अर्थ है,बिना किसी इनाम कि उम्मीद के या इस दुनिया अथवा अगली दुनिया में किसी भी सजा के डर के बिना काम करनाऐसे किया गया कार्य लक्ष्य तक पहुँचने का साधन है और भगवान् वो लक्ष्य है-रामकृष्ण परमहंस

अर्थात् व्यक्ति को बिना किसी कर्मफल की इच्छा के कार्य करना चाहिए।जब हम कोई भी कार्य बिना किसी इनाम की उम्मीद के या किसी सजा के डर के,करते हैं तो हम पर कोई दबाव नहीं होता और हम परोपकार का कार्य आसानी से कर सकते हैं।जिस व्यक्ति के मन में कोई डर अथवा लोभ-लालच नहीं होता केवल वही व्यक्ति ऐसे कार्य कर सकता है जो अन्यों की भलाई के लिए हों और केवल ऐसे कार्य ही भगवान् को प्रिय होते हैं और मानव जीवन का परम लक्ष्य जो भगवान् को प्राप्त करना है केवल ऐसे ही कार्यों के द्वारा संभव होता है।

एक बार आपराधिक होने पर कोई अपमान नहीं होता।आपराधिक बने रहना अपमान है।-मलकोम एक्स०

अर्थात् व्यक्ति से जाने –अनजाने ऐसे कार्य हो सकते हैं जो आपराधिक हों।पर यदि ये अपराध पहली बार हुआ हो तो व्यक्ति प्रायश्चित कर उस पाप से मुक्त हो सकता है।पर यदि व्यक्ति बार –बार आपराधिक कार्य करता है तो इसका अर्थ ये है कि वो सुधरना नहीं चाहता।इससे बड़ा अपमान क्या हो सकता है कि व्यक्ति आपराधिक बना रहे और अपने ऊपर अपराधी होने का ठप्पा लगवा ले।

अपने साथिओं से श्रेष्ठ होने में कुछ भी महान नहीं है।सच्ची महानता,अपने पूर्व स्व से श्रेष्ठ होने में निहित है।-अर्नेस्ट हेमिंग्वे

अर्थात् कोई भी व्यक्ति अपने साथियों से श्रेष्ठ हो सकता है।इसलिए इसमें कोई भी महानता नहीं है।लेकिन यदि आप अपने भीतर लगातार सुधार करते जाते हैं और अपनी आत्मा को और उन्नत करते जाते हैं तो एक दिन सर्वश्रेष्ठ हो जाते हैं और मोक्ष के अधिकारी बन जाते हैं।कहने का अर्थ ये है कि केवल अपने आप को अर्थात् अपनी आत्मा को उन्नत करना ही सबसे बड़ी महानता है क्योंकि जिसने अपनी आत्मा को शुद्ध नहीं किया और परमात्मा के द्वार तक उसको लेकर नहीं गया तो वो महान कैसे हो सकता है।

दीवार पर सूरज कि रोशनी गिर गई,दीवार को उधार की महिमा मिली।क्यों पृथ्वी के एक टुकड़े पर अपना दिल लगाता है,ओ सरल मनुष्य?ऐसे स्रोत की तलाश करें जो हमेशा के लिए चमकता है।–जलालुद्दीन रूमी

अर्थात् व्यक्ति को भौतिक वस्तुओं का लोभ-लालच नहीं करना चाहिए क्योंकि भौतिक वस्तुएं हमेशा के लिए रहने वाली नहीं हैं।धन-दौलत की चमक केवल कुछ ही समय के लिए होती है क्योंकि ये सदा हमारे साथ नहीं रह सकती।एक न एक दिन धन-दौलत हमारा साथ छोड़ देती है।जब हमारे पास दौलत होती है तो कुछ समय के लिए हम सेठ कहलाते हैं पर जब दौलत चली जाती है तो हम फिर से गरीब हो जाते हैं।हमें केवल हमेशा रहने वाले स्रोत्र अर्थात् भगवान् की तलाश करनी चाहिए।भगवान् शाश्वत हैं और उनके तेज के आगे सब कुछ फीका है।जिसने भगवान् को पा लिया उसका व्यक्तित्व हमेशा के लिए चमकदार हो गया।इसलिए केवल भगवान् की ही भक्ति करनी चाहिए न कि धन सम्पदा की।