PONDERABLE:46- CONTENTMENT

Contentment gives the best pleasure. -Patanjali

VIZ The person who has satisfaction in his heart does not have worry that I want more. In the desire to get something more, he is not deprived of enjoying the happiness and pleasure of what he possess. Although, because he does not have much greed, he is happy in whatever he has. Thus, contentment brings the best pleasure.

If man waits, then everything is received. -Disraeli

VIZ There is no such thing in the life, which a person cannot obtain. But it is not necessary that one wishes for something and that he get it right away. Sometimes it is necessary to wait to get anything. Only the Karma should be done and the one who wants to get it should wait for it to be received. If the person tries wholeheartedly and does not hasten, there is no reason why he will not get desired object.

Poverty also glorify, if a person is having endurance. Dilapidated clothes also look good when washed. Tasteless food also feels tasty, when it is warm. and ugliness also looks good, due to the beautiful nature. Chanakya

VIZ Chanakya ji says that the way the dilapidated clothes look good when washed, the tasteless food also becomes tasty when heated, and the ugliness also looks great due to the beautiful nature, viz, a goodness hides all the faults of the person, In the same way, the goodness named contentment also covers the poverty of the person. In comparison to a person who is not satisfied, even after being wealthy, and always run after more money, such a person, who is poor, but is contented, and hence nobody sees his poverty, is always more graceful.

All the directions are always pleasable for the satisfying mind. -Bhagwat Geeta

VIZ When a person learns to be satisfied, then he starts enjoying whatever he has with him and does not fall in desire of getting more. Thus, he feels the pleasure. It has been said that the whatever the person thinks, he sees the atmosphere around him in the same way. That is why a happy person finds that all the directions around him are filled with happiness. Whereas, when the person desires to get more then not only he loses his happiness, but he starts seeing sadness all around him.

The one, who is satisfied within the least, he has, is the most prosperous. Contentment is the wealth of nature. -Socrates

VIZ The person should learn from nature. The nature always remains satisfied with whatever it has. Even if the person who has very little, but is satisfied, then he will consider himself wealthy in that. But if the person has a lot and he is not satisfied with that and if he wishes to get more, then he will never consider himself rich. When he sees himself with low vision, then others will also see him with low vision, i.e.do not accept him as wealthy. Thus, satisfaction itself is actually the most essential wealth of man.

HINDI TRANSLATION: हिंदी अनुवाद

विचारणीय:४६ संतोष

संतोष से सर्वोत्तम सुख प्राप्त होता है।-पतंजलि

अर्थात् जिस व्यक्ति के हृदय में संतोष होता है उसे इस बात की चिंता नहीं होती कि मुझे और चाहिए।वो कुछ और पाने की चाह में जो उसके पास है उसका आनंद और सुख प्राप्त करने से वंचित नहीं होता।अपितु अधिक लालसा न होने के कारण वो उसी में सुखी रहता है जो कुछ उसके पास है।इस प्रकार संतोष से सर्वोत्तम सुख प्राप्त होता है।

यदि मनुष्य प्रतीक्षा करें,तो हर वस्तु प्राप्त हो जाती है।-डिजरायली

अर्थात् जीवन में कोई भी वस्तु ऐसी नहीं है जो व्यक्ति प्राप्त न कर सके।पर जरूरी नहीं है कि व्यक्ति किसी वस्तु की कामना करे और वो उसे तुरंत ही मिल जाए।कभी-कभी कोई भी वस्तु पाने के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ती है।व्यक्ति को केवल कर्म करते रहना चाहिए और जो वो पाना चाहता है उसके प्राप्त होने की प्रतीक्षा करनी चाहिए।व्यक्ति यदि पूरे मनोयोग से प्रयत्न करे और जल्दबाजी न करे तो कोई कारण नहीं है कि उसे मनवांछित वस्तु न मिले।

धीरज होने से दरिद्रता भी शोभा देती है।धुले हुए होने से जीर्ण वस्त्र भी अच्छे लगते हैं।घटिया भोजन भी गर्म होने पर सुस्वाद लगता है और सुन्दर स्वभाव के कारण कुरूपता भी शोभा देती है।–चाणक्य

अर्थात् चाणक्य जी कहते हैं कि जिस प्रकार धुले हुए जीर्ण वस्त्र भी अच्छे लगते हैं ,घटिया भोजन भी गर्म होने पर सुस्वाद लगता है और सुन्दर स्वभाव के कारण कुरूपता भी शोभा देती है अर्थात् एक अच्छाई,व्यक्ति के सभी अवगुणों को छुपा लेती है,उसी प्रकार घीरज नाम की अच्छाई व्यक्ति की दरिद्रता को भी ढक लेती है।ऐसे व्यक्ति की अपेक्षा जो धनवान होने के बावजूद संतुष्ट नहीं रह पाता और अधिक धन के पीछे भागता रहता है,ऐसा व्यक्ति जो गरीब है पर चूंकि संतुष्ट है इसलिए उसकी गरीबी किसी को दिखाई नहीं देती,ज्यादा शोभावान है।

संतुष्ट मन वाले के लिए सदा सभी दिशाएँ सुखमयी हैं।–भागवत गीता

अर्थात् जब व्यक्ति संतुष्ट रहना सीख जाता है तो वह जो कुछ उसके पास है उसका ठीक से उपभोग करने लगता है और अतिरिक्त की चाह में नहीं पड़ता।इस प्रकार उसे सुख का अनुभव होता है।कहा गया है व्यक्ति जैसा सोचता है वैसा ही उसे अपने आस-पास का वातावरण नजर आता है।इसलिए एक सुखी व्यक्ति को अपने आस-पास की सभी दिशाएँ सुखमयी नजर आती हैं।वहीं जब व्यक्ति और प्राप्त करने की इच्छा रखता है तभी वो अपना सुख –चैन खो देता है और उसे चहुँ-ओर दुःख ही दुःख दिखने लगता है।

अत्यल्प से जो संतुष्ट हो जाता है,वह सबसे अधिक समृद्ध हैसंतोष प्रकृति का धन है।–सुकरात

अर्थात् व्यक्ति को प्रकृति से सीखना चाहिए।प्रकृति हमेशा जो उसके पास है उससे संतुष्ट रहती है।चाहे व्यक्ति के पास बहुत कम हो पर यदि वो संतुष्ट है तो वो अपने आप को उतने में ही समृद्ध मानेगा।पर यदि व्यक्ति के पास बहुत कुछ है पर वो उससे संतुष्ट नहीं है और वो अधिक पाने की चाह रखता है तो वो अपने आप को कभी समृद्ध नहीं मानेगा।जब वो खुद को ही हेय दृष्टि से देखेगा तो अन्य तो उसे वैसा देखेंगे ही अर्थात् समृद्ध नहीं मानेंगे।इस प्रकार संतोष ही वास्तव में मनुष्य का सबसे जरूरी धन है।