Think:

A question in my mind is emerging for a long time.

Does the soul have any gender, caste or religion?

In my opinion, there is no gender, caste or religion of Soul. God also says in the Gita that the soul does not born and does not die. He cannot be cut by any weapon, no fire can burn him, the air does not absorb it.

But the soul can be unclean. It can be deluded by the sins like divisiveness, Maya, subject, lust, anger and burning.

When with this selfish and impure soul, two men, two women or one man and one woman are physically attracted with each other, then it may be wrong. When the person with this depredated soul ,slaughts in the name of caste and religion, then this is wrong.

When the soul is in its purest form then it is embellished with qualities such as love, affection, patience, contentment, benevolence, cooperation.

When such two souls, who become good by the same holy thoughts, encounter each other, then they create an affinity. Then there is no caste, no religion, no age, there is no hatred, no man, no woman and no negative thoughts. There is only soul which is in its best form and thinks better in affinity.

Such a soul is in touch with God. Such an affair we can read in the context of Krishna-Radha, Krishna-Mira, Krishna-Sudama, Ram-Shabri, Ram-Hanuman etc.

Whether this kind of intimacy is between a male and male, in female and female or in a male and female, according to me, there is no harm in it. I have already given above, examples of this kind of love. Only such type of pure souls can establish the feeling, where no one will fight with anyone, will not kill anyone.

I believe it is that when a person takes away his soul from the impure ideology and takes towards holy thought and involve others in it, then he keeps his steps towards salvation. Such a person will finally be able to merge with God.

Should everyone not think that we are all a soul, and we have no gender, no caste, no religion, then why do we fight for different reasons, and are contaminated by negative thoughts, trapped in materialism and Make this world like hell?

Please Think…………..?

If an intellectual does not agree with my words then please guide me .

HINDI TRANSLATION:हिंदी अनुवाद

जरा सोचिये :

मेरे मन में एक प्रश्न बहुत दिनों से उभर रहा है.

क्या आत्मा का कोई लिंग होता है,जाति होती है,धर्म होता है ?

मेरे विचार में तो आत्मा का कोई लिंग ,जाति या धर्म नहीं होता .भगवान् भी गीता में कहते हैं कि आत्मा न पैदा होती है न मरती है .उसे कोई शस्त्र काट नहीं सकता ,कोई अग्नि उसे जला नहीं सकती,हवा उसे अवशोषित नहीं कर सकती .

पर आत्मा मैली अवश्य हो सकती है .मोह,माया ,विषय,वासना,क्रोध,जलन आदि अवगुणों के द्वारा ये कलुषित हो सकती है .

जब इसी कलुषित आत्मा के साथ ,भौतिक रूप से दो पुरुष,दो स्त्रियाँ या एक पुरुष और एक स्त्री आपस में आकर्षित होते हैं तो ये गलत हो सकता है.जब इसी कलुषित आत्मा के साथ व्यक्ति जाति,धर्म के नाम पर कत्लेआम करता है तो ये गलत है.

जब आत्मा अपने पवित्रतम रूप में होती है तब वो प्रेम,स्नेह,धैर्य,संतोष,परोपकार ,सहयोग आदि गुणों के द्वारा अलंकृत होती है.

जब ऐसी दो आत्माएं जो एक जैसे ही पवित्र विचारों के द्वारा उत्तम हों ,एक दूसरे के संपर्क में आती हैं तो उनमें एक आत्मीयता पैदा हो जाती है .तब न कोई जाति होती है ,न कोई धर्म होता है ,न कोई उम्र होती है ,न कोई द्वेष ,न कोई पुरुष होता है ,न स्त्री होती है और न कोई कलुषित विचार होते हैं .केवल आत्मा होती है जो अपने उत्तम रूप में होती है और एक जैसा ही उत्तम सोचती हैं.

ऐसी आत्मा परमात्मा के संपर्क में होती है .ऐसी आत्मीयता जो कृष्ण -राधा ,कृष्ण -मीरा ,कृष्ण -सुदामा ,राम-शबरी,राम-हनुमान आदि के  सन्दर्भ में सुनने ,पढने को मिलती है .

इस प्रकार की आत्मीयता चाहे पुरूष-पुरुष में हो,स्त्री-स्त्री में हो अथवा पुरूष-स्त्री में हो ,इसमें मेरे विचारों के अनुसार कोई बुराई नहीं है.मैंने उदाहरण ऊपर ही दिए हैं.इस प्रकार की उत्तम आत्मा ही संसार में प्रेम की भावना को स्थापित कर सकती है जहाँ कोई किसी से न लडे,किसी को न मारे .

मेरा मानना ये है कि जब व्यक्ति अपनी आत्मा को कलुषित विचारधारा से हटा कर पवित्र विचारधारा की तरफ ले जाता है और अन्यों को भी इस में शामिल कर पाता है ,तो वो मोक्ष की ओर अपने कदम रख देता है.ऐसा व्यक्ति संसार के चक्र से छूट कर अंतत परमात्मा में ही विलीन हो जाता है .

क्या सभी को ऐसा नहीं सोचना चाहिए कि हम सब एक आत्मा हैं और न हमारा कोई लिंग है,न जाति है,न धर्म तब हम अलग -अलग कारणों से क्यूँ लड़ते रहते हैं और कलुषित विचारों के द्वारा दूषित हुए ,भौतिकता में फंस कर संसार को नरक जैसा बना देते हैं .

जरा सोचिये…………..?

अगर कोई बुद्धिजीवी मेरी बातों से सहमत न हो तो कृपया कर के मेरा मार्गदर्शन करे.